नई दिल्ली. बॉलीवुड में मसाला और पॉलिटिकल ड्रामा का मेल हमेशा से दर्शकों का पसंदीदा रहा है. फिल्म ‘राम्या’ इसी विरासत को आगे बढ़ाती है, जिसमें सत्ता के गलियारे, जेल की कोठरी की चार दीवारी और एक आम आदमी के हीरो बनने के सफर को दिखाया गया है. डायरेक्टर संतोष परब और अभिनेता जन्मेजय सिंह के सहयोग से बनी यह फिल्म आधुनिक तकनीक के जरिए 90 के दशक के सिनेमाई अंदाज को पेश करने का एक सच्चा प्रयास है.
कहानी
फिल्म की कहानी ‘राम्या’ नाम के एक नौजवान के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसकी दुनिया तब बिखर जाती है जब सत्ता की हवस और राजनीतिक साजिशें उसकी जिंदगी में जहर घोल देती हैं. फिल्म की शुरुआत जोरदार होती है. मुख्य किरदार जन्मेजय पर कानून की धारा 307 और 324 के तहत गंभीर आरोप लगते हैं और उसे जेल भेज दिया जाता है, फिर जैसे-जैसे कहानी की परतें खुलती हैं, दर्शकों को एहसास होता है कि जन्मेजय कोई अपराधी नहीं, बल्कि परिस्थितियों का शिकार है. स्क्रीनप्ले में नाटकीय पलों को बड़ी ही सहजता से बुना गया है.
एक्टिंग
फिल्म की कहानी पूरी तरह से जन्मेजय सिंह पर बेस्ड है और एक नए अभिनेता के तौर पर पर्दे पर उनकी मेहनत साफ दिखाई पड़ती है. जेल में उनका एंट्री सीन, जहां उनका स्वैग और बॉडी लैंग्वेज सचमुच देखने लायक है, जो यह साबित करता है कि उनमें एक एक्शन स्टार बनने की पूरी क्षमता है. उन्होंने अपनी एक्टिंग की गहराई को न केवल एक्शन दृश्यों में, बल्कि दुख और बेबसी दिखाने वाले दृश्यों में भी बखूबी दिखाया है. वहीं, सपोर्टिंग रोल में समीरा राव की फिल्म में मौजूदगी कहानी में एक बहुत जरूरी कोमलता भर देती है. सयाजी शिंदे ने एक बार फिर जटिल किरदारों को निभाने में अपनी महारत साबित की है. स्क्रीन पर उनकी मौजूदगी फिल्म को एक मजबूत आधार देती है. अपने खास अंदाज में अशोक समर्थ फिल्म के तनाव को प्रभावी ढंग से बनाए रखते हैं.
डायरेक्शन और सिनेमैटोग्राफी
डायरेक्टर संतोष परब ने फिल्म के मिजाज और गति पर अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखी है. उनका दृष्टिकोण स्पष्ट है. उन्होंने फिल्म की कहानी के उतार-चढ़ावों और किरदारों की भूमिकाओं को बड़ी ही बारीकी से संभाला है. वहीं, सिनेमैटोग्राफी की बात करें तो नवीन वी. मिश्रा का काम काबिले तारीफ है. उन्होंने अपने फ्रेम में जेल के माहौल की घुटन और राजनीतिक रैलियों की भव्यता, दोनों को ही बड़ी कुशलता से कैद किया है. फिल्म की लाइटिंग और विजुअल स्टाइल कहानी के गंभीर मिजाज को पूरी तरह से निखारते हैं. हर फ्रेम एक कहानी कहता है, जो फिल्म के पूरे माहौल को जीवंत कर देता है.
फिल्म की सफलता में अमित के. कौशिक की एडिटिंग भी अच्छी है.
बैकग्राउंड स्कोर
बिप्लब दत्ता का बैकग्राउंड स्कोर फिल्म की जान है. खासकर एक्शन दृश्यों और हीरो की एंट्री के दौरान जो बैकग्राउंड में म्यूजिक बजता है वो दर्शकों में जोश भर देता है. सुषमा सुमन की कोरियोग्राफी फिल्म के ग्लैमरस पहलू को बैलेंस करती है. गानों और एक्शन सीन्स को सही जगह पर इस्तेमाल किया गया है, जो कहानी को अच्छे से आगे बढ़ाता है. किंडर डब्ल्यू. सिंह द्वारा डिजाइन किए गए एक्शन सीन एकदम असली और असरदार हैं. जेल के अंदर फिल्माए गए लड़ाई के दृश्य बेहद असली लगते हैं.
कमियां
अपनी कई खूबियों के बावजूद, इस फिल्म में कुछ कमियां भी नजर आती हैं. कई जगहों पर, यह फिल्म 1990 के दशक की घिसी-पिटी कहानियों की याद दिलाती है. कहानी के कुछ मोड़ तो काफी पहले से ही पता चल जाते हैं. हालांकि डायलॉग्स असरदार हैं, लेकिन कुछ जगहों पर वे थोड़े ज्यादा ही नाटकीय हो जाते हैं. फिल्म का फर्स्ट हाफ थोड़ा स्लो लगता है, जिससे आप थोड़ा बोरियत भी महसूस कर सकते हैं, लेकिन सेकंड हाफ तक फिल्म अपनी रफ्तार में लौट आती है. वहीं, समैरा राव जैसी टैलेंटेड एक्ट्रेस को फिल्म में करने के लिए और भी बहुत कुछ दिया जा सकता था, लेकिन फिल्म का पूरा ध्यान पूरी तरह से मुख्य किरदार के संघर्ष पर ही केंद्रित रहा.
अंतिम फैसला
‘राम्या’ एक ऐसी फिल्म है जो पूरे मनोरंजन का वादा करती है. यह उन दर्शकों के लिए एक बेहतरीन तोहफा है जिन्हें एक्शन, ड्रामा और जोरदार अभिनय पसंद है. जन्मेजय सिंह का दमदार अभिनय, संतोष परब का सधा हुआ निर्देशन और बिप्लब दत्ता का जोशीला संगीत मिलकर एक यादगार सिनेमाई अनुभव रचते हैं. मेरी ओर से इस फिल्म को 5 में से 3.5 स्टार.
