नई दिल्ली. ‘सूबेदार’ एक रिटायर्ड सैनिक के संघर्ष, उसकी अंदरूनी और बाहरी लड़ाइयों की कहानी दिखाती है, लेकिन बदकिस्मती से यह फिल्म सिर्फ अनिल कपूर के कंधों तक ही सीमित रह जाती है. कमजोर स्क्रिप्ट और बिना लॉजिकल सीन की वजह से यह फिल्म दर्शकों के लिए एक थकाने वाला अनुभव साबित होती है.
कहानी
कहानी अर्जुन मौर्य (अनिल कपूर) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो 25 साल बॉर्डर पर देश की सेवा करने के बाद ‘सूबेदार’ के पद से रिटायर होकर घर लौटा है. रिटायरमेंट के बाद, अर्जुन अपनी जिंदगी को पटरी पर लाने की कोशिश करता है, लेकिन अपने अतीत की कड़वाहट और एक मिलिट्री ऑफिसर का डिसिप्लिन उसे दुनिया में एडजस्ट करने से रोकता है. उसका दोस्त प्रभाकर (सौरभ शुक्ला), जो एक छोटी सिक्योरिटी एजेंसी चलाता है, उसे बिजी रखने के लिए काम देता है. इस दौरान, अर्जुन का सामना शहर के रेत माफिया से होता है. कहानी में ‘सॉफ्टी’ (फैसल मलिक) और ‘प्रिंस भैया’ (आदित्य रावल) मिलते हैं. ये दोनों असली मास्टरमाइंड ‘बबली दीदी’ (मोना सिंह) के मोहरे हैं, जो जेल के अंदर से अपना गैर-कानूनी साम्राज्य चलाती है. अर्जुन के पास इस माफिया का सामना करने की एक पर्सनल वजह है- एक रेत ट्रक से हुए एक्सीडेंट में उसकी पत्नी की मौत, लेकिन फिल्म में इस कनेक्शन को डायरेक्ट नहीं दिखाया गया है, इसलिए दर्शकों को इस कनेक्शन को कनेक्ट करने में परेशानी हो सकती है. एक तरफ अर्जुन का माफिया से झगड़ा होता है, तो दूसरी तरफ अपनी बेटी श्यामा (राधिका मदान) के साथ उसके बिगड़े हुए रिश्ते भी. श्यामा कॉलेज में उसके साथ हो रहे हैरेसमेंट से काफी परेशानी रहती है. क्या अर्जुन अपना गुस्सा कंट्रोल कर पाएगा? क्या वह अपनी बेटी का भरोसा जीत पाएगा? फिल्म इन्हीं सवालों के आस-पास बुनी गई है, लेकिन इसका स्ट्रक्चर बहुत ढीला है.
स्क्रीनप्ले
फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी स्क्रिप्ट है. राइटर और डायरेक्टर सुरेश त्रिवेणी ने एक ऐसी दुनिया बनाने की कोशिश की है जिसमें लॉजिक की बहुत कमी है. पूरी फिल्म में आपके मन में कई सवाल उठते हैं, जिनका जवाब फिल्म नहीं दे पाती:
किरदार का दोहरापन: एक बहादुर सूबेदार, जिसने बॉर्डर पर दुश्मन को हराया है, वह शहर के छोटे-मोटे गुंडों के सामने इतना ‘लाचार’ और चुप क्यों है?
बेतुके फैसले: अर्जुन जैसा सेल्फ-रिस्पेक्टिंग आदमी बबली दीदी (माफिया) के पास नौकरी के लिए क्यों जाता है? क्या एक पुराने मिलिट्री ऑफिसर को समझ नहीं आया कि वह किससे डील कर रहा है?
बेटी का एंगल: राधिका मदान और अनिल कपूर के बीच के डायलॉग बहुत बचकाने लगते हैं. एक पिता, जो अपनी बेटी के लिए अपनी जान दे सकता है, उसे यह क्यों नहीं समझा पाता कि उसकी चुप्पी उसकी कमजोरी के अलावा कुछ नहीं है?
बेकार समाज और कानून: फिल्म में दिखाया गया शहर पूरी तरह से ‘मरा हुआ’ लगता है. पुलिस और कानून लागू करने वाली एजेंसियों को ऐसे बेबस दिखाया गया है, जैसे उनका कोई वजूद ही नहीं है.
बिना किसी तालमेल के क्लाइमैक्स: कहानी के कई ट्विस्ट पूरी तरह से ‘फिल्मी’ और बनावटी लगते हैं. क्लाइमैक्स तक आते-आते फिल्म पूरी तरह से पटरी से उतर जाती है. फिल्म को खत्म करने की कोशिश में डायरेक्टर ने इतनी कल्पना बर्बाद कर दी है कि एंडिंग सिर्फ सिरदर्द बन जाती है.
एक्टिंग
अनिल कपूर: 60 साल से ज्यादा उम्र के अनिल कपूर आज भी स्क्रीन पर जादुई लगते हैं. उन्होंने सूबेदार के किरदार में जान डालने की पूरी कोशिश की है. उनके चेहरे पर झुर्रियां और आंखों में गुस्सा रोल की डिमांड पूरी करते हैं, लेकिन एक कमजोर स्क्रिप्ट बड़े से बड़े एक्टर को भी डुबो सकती है.
राधिका मदान: राधिका एक शानदार एक्ट्रेस हैं, लेकिन यहां उनके पास करने के लिए ज्यादा कुछ नहीं था. उनका रोल सिर्फ चिढ़ने और चिल्लाने तक ही लिमिटेड है.
मोना सिंह: मोना सिंह ने ‘बबली दीदी’ के रोल में कुछ नया करने की कोशिश की है. उनका नेगेटिव रोल दिलचस्प है, लेकिन उनके कैरेक्टर में वह गहराई नहीं है जो एक ‘मास्टरमाइंड’ विलेन में होनी चाहिए.
सौरभ शुक्ला: सौरभ शुक्ला हमेशा की तरह शानदार दिखे हैं. उन्होंने अर्जुन के दोस्त और मेंटर का रोल ईमानदारी से किया है.
आदित्य रावल और फैजल मलिक: दोनों एक्टर विलेन के रोल में असर डालने में फेल रहे. ‘प्रिंस’ का कैरेक्टर सिर्फ शरारत तक ही लिमिटेड है, और उसमें कोई डर नहीं है.
डायरेक्शन और सिनेमैटोग्राफी
डायरेक्शन: सुरेश त्रिवेणी, जिन्होंने ‘तुम्हारी सुलु’ जैसी पसंदीदा फिल्म दी, यहां पूरी तरह से चूक गए हैं. ‘सूबेदार’ में इमोशन या थ्रिल की कमी है. डायरेक्शन में क्लैरिटी की कमी है. वह तय नहीं कर पा रहे हैं कि इसे एक इंटेंस ड्रामा बनाएं या एक टिपिकल रिवेंज ड्रामा.
सिनेमैटोग्राफी: फिल्म के कुछ विजुअल्स अच्छे हैं, खासकर रेत के टीले और धूल भरी सड़कें, जिन्हें अच्छी तरह से शूट किया गया है. लेकिन कुछ जगहों पर लाइटिंग और फ्रेमिंग बहुत डार्क है, जिससे इसे देखना अनकम्फर्टेबल हो जाता है.
कमियां
धीमी रफ्तार: फिल्म की रफ्तार इतनी धीमी है कि आपको बार-बार घड़ी देखने पर मजबूर होना पड़ेगा.
बेमतलब की बात: कहानी में इतनी कमियां हैं कि उन्हें भरना नामुमकिन है. रिटायरमेंट के बाद शहर के हालात के बारे में सूबेदार की नासमझी बर्दाश्त से बाहर है.
म्यूजिक: फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर और म्यूजिक एवरेज से भी कम है. कोई भी गाना या धुन यादगार नहीं रहती.
मेलोड्रामा: बाप-बेटी के झगड़े को बेवजह खींचा गया है, जिससे इमोशन के बजाय बोरियत पैदा होती है.
अंतिम फैसला
‘सूबेदार’ एक ऐसी फिल्म है जिसे आपको सिर्फ अनिल कपूर के लिए देखना चाहिए, बशर्ते आपके पास बहुत सब्र हो. फिल्म की बुनियाद, यानी इसकी स्क्रिप्ट इतनी कमजोर है कि उस पर एक अच्छी कहानी नहीं बन सकती. अगर आप आर्मी बैकग्राउंड वाली एक दमदार रिवेंज ड्रामा की उम्मीद कर रहे हैं, तो यह फिल्म आपको निराश करेगी. अगर आपको ओटीटी पर कुछ बेहतर नहीं मिल रहा है, तो ही इसे देखें. नहीं तो, अनिल कपूर की पुरानी, बेहतर फिल्में देखना ज्यादा फायदेमंद होगा.
