नई दिल्ली. द वायरल फीवर (TVF) ने पिछले कुछ सालों में भारतीय डिजिटल दुनिया में अपनी एक अलग पहचान बनाई है. ‘पंचायत’ और ‘गुल्लक’ जैसी सीरीज देने के बाद इस प्रोडक्शन हाउस ने लाखों युवाओं की मुश्किलों को आवाज दी जो यूपीएससी एग्जाम की तैयारी कर रहे थे, जब उन्होंने पहली बार ‘एस्पिरेंट्स’ पेश की थी. अब अपने तीसरे सीजन के साथ, यह सीरीज मुखर्जी नगर की तंग गलियों से निकलकर सत्ता के गलियारों और सिस्टम की जटिलताओं में उतर गई है. दीपेश सुमित्रा जगदीश द्वारा निर्देशित और लिखी गई यह सीरीज एक बार फिर साबित करती है कि आखिर में समय ही रिश्तों के नतीजों को तय करता है.
कहानी
‘एस्पिरेंट्स 3’ की कहानी ठीक वहीं से शुरू होती है जहां सीजन 2 खत्म हुआ था. कहानी अब सिर्फ ‘एस्पिरेंट्स’ होने के दौर तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह उन चुनौतियों पर फोकस करती है जो एक सफल व्यक्ति बनने के बाद सामने आती हैं. ‘ट्राइपॉड’ की दोस्ती जिसमें अभिलाष (नवीन कस्तूरिया), एसके (अभिलाष थपलियाल) और गुरी (शिवांकित सिंह परिहार) शामिल हैं… अब एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां उनके निजी उसूल और पेशेवर जिम्मेदारियां सीधे तौर पर एक-दूसरे से टकरा रही हैं. इस सीजन का मुख्य फोकस अभिलाष शर्मा और संदीप भैया (सनी हिंदुजा) के बीच वैचारिक और कानूनी टकराव है. संदीप भैया ने अभिलाष पर गंभीर आरोप लगाए हैं, जो इस समय रामपुर के जिलाधिकारी (डीएम) के पद पर तैनात हैं. आरोप यह है कि अभिलाष ने एक टेंडर प्रक्रिया के दौरान अपने पुराने दोस्त, गुरी के प्रति पक्षपात दिखाया. एक तरफ उनके सामने अपना करियर बचाने की चुनौती है, तो दूसरी तरफ अपनी ईमानदारी और दोस्तों के प्रति अपनी वफादारी साबित करने का दबाव है. इसी बीच, अतीत का एक और किरदार पवन कुमार सामने आता है, जो अभिलाष के लिए एक नई चुनौती खड़ी करता है, जिससे कहानी में रहस्य और रोमांच की और भी परतें जुड़ जाती हैं.
एक्टिंग
एक्टिंग के मामले में, ‘एस्पिरेंट्स’ हमेशा से ही एक मास्टरक्लास रहा है और इसका तीसरा सीजन भी कोई अपवाद नहीं है. नवीन ने अभिलाष के किरदार में आए बदलावों को बहुत खूबसूरती से दिखाया है. एक चिड़चिड़े स्टूडेंट से एक गंभीर और शांत आईएएस ऑफिसर बनने का सफर उनकी आंखों और हाव-भाव में साफ नजर आता है. संदीप भैया का किरदार इस सीरीज की जान है. एक बार फिर, सनी हिंदुजा ने अपनी परफॉर्मेंस से इस किरदार में जान डाल दी है. उनके किरदार की गंभीरता और उनके उठाए गए नैतिक सवाल दर्शकों को खुद के अंदर झांकने पर मजबूर कर देते हैं. एसके सर के रूप में अभिलाष की सादगी और गुरी के रूप में शिवांकित का गुस्सैल लेकिन वफादार अंदाज ‘ट्राईपॉड’ की केमिस्ट्री को जिंदा रखता है. दोनों ही कलाकारों ने दोस्ती में आने वाली दरारों और उसके बाद सुलह की प्रक्रिया को बहुत बेहतरीन ढंग से दिखाया है. वहीं, धैर्य के किरदार में नमिता ने एक ऐसी शांति और स्थिरता बनाए रखी है जो इस तनाव भरे नैरेटिव के लिए बहुत जरूरी थी.
डायरेक्शन
डायरेक्टर और राइटर दीपेश सुमित्रा जगदीश तारीफ के हकदार हैं, जिस तरह से उन्होंने इस सीजन में फ्लैशबैक और वर्तमान को बड़ी सहजता से आपस में बुना है. सीरीज की शुरुआत अभिलाष के एक इंटरव्यू से होती है, जिसमें एक जर्नलिस्ट उनसे आईआरएस ऑफिसर से आईएएस ऑफिसर बनने तक के उनके सफर के बारे में सवाल पूछता है. अभिलाष का मार्मिक और उदास भरा जवाब ‘इसमें करना ही क्या है? मैं खुश हूं’ उनके किरदार की गहराई को दिखाता है. इस बार मेकर्स ने यह दिखाने की कोशिश की है कि जब किसी को पावर मिल जाता है, तो रिश्तों में किस तरह के बदलाव आते हैं.
म्यूजिक
सीरीज की गति बेहद संतुलित है. एडिटिंग इस तरह से की गई है कि मुखर्जी नगर के पुराने दिनों के फ्लैशबैक आज के कानूनी दांव-पेचों से कभी भी टकराते नहीं हैं. संगीत हमेशा की तरह दिल को छू लेने वाला है. इसमें इतनी ताकत है कि यह भावुक दृश्यों के दौरान दर्शकों की आंखों में आंसू ला सकता है. विशेष रूप से बैकग्राउंड स्कोर क्लाइमैक्स के दौरान अनुभव को एक बिल्कुल ही अलग स्तर पर ले जाता है.
कमियां
इतना बेहतरीन सीजन होने के बावजूद, कुछ छोटी-मोटी कमियां साफ नजर आती हैं. अभिलाष और दीपा के बीच के रोमांस को इस सीजन में थोड़ा और स्क्रीन टाइम मिलना चाहिए था. उनका रिश्ता बहुत तेजी से आगे बढ़ता हुआ लगता है, जिससे दर्शक उनके बीच उस गहरे जुड़ाव को सचमुच महसूस नहीं कर पाते-वैसा जुड़ाव जो पिछले सीजन्स में साफ दिखाई देता था. कुछ जगहों पर डायलॉग थोड़े ज्यादा ही उपदेश देने वाले हो जाते हैं, जिससे कहानी का नेचुरल फ्लो थोड़ा बाधित होता है.
अंतिम फैसला
‘एस्पिरेंट्स 3’ सिर्फ एक वेब सीरीज नहीं है, यह उन लोगों के लिए एक आईने का काम करती है जो सफलता के शिखर पर पहुंचने के बाद अपने रिश्तों और अपने मूल सिद्धांतों को नजरअंदाज कर देते हैं. यह सीरीज हमें सिखाती है कि सच्ची सफलता सिर्फ पद या प्रतिष्ठा से तय नहीं होती, बल्कि उन लोगों को थामे रखने से तय होती है जो आपके संघर्ष के दिनों में आपके साथ खड़े रहे. इस सीरीज का क्लाइमैक्स इसकी सबसे बड़ी ताकत है. यह आपको रुला भी देगा और साथ ही आपको सोचने पर भी मजबूर कर देगा. जिस मोड़ पर कहानी खत्म होती है, वह इस बात का साफ संकेत है कि ‘ट्राईपॉड’ की गाथा अभी खत्म होने से कोसों दूर है, जिससे यह पक्का हो जाता है कि अगले सीजन का बेसब्री से इंतजार किया जाएगा. मेरी ओर से सीरीज के तीसरे सीजन को 5 में से 3.5 स्टार.
