नई दिल्ली. जब फिल्म का ट्रेलर रिलीज हुआ तो यह एक और सिंपल लव ट्रायंगल या धोखे पर आधारित ड्रामा जैसा लगा. हालांकि, पूरी फिल्म देखने के बाद यह सोच पूरी तरह बदल जाती है. विकास अरोड़ा के डायरेक्शन में बनी यह फिल्म सिर्फ प्यार और झगड़े की कहानी नहीं है, बल्कि इंसानी फितरत, इनसिक्योरिटी और उस खालीपन का भी डॉक्यूमेंट है जो अक्सर हमसे छूट जाता है.
कहानी
फिल्म की शुरुआत हमें जतिन सरना (कुशाल) और मधुरिमा रॉय की दुनिया में ले जाती है. उनकी केमिस्ट्री किसी फिल्मी सेटअप जैसी नहीं लगती, बल्कि हमारे आस-पास दिखने वाले किसी भी आम कपल जैसी लगती है. मधुरिमा की मासूमियत और जतिन का शांत स्वभाव एक इमोशनल बुनियाद बनाता है जो तुरंत दर्शकों से जुड़ जाती है. प्रणय पचौरी के आने के साथ कहानी मुश्किल हो जाती है. यहां से, फिल्म एक लव ट्रायंगल का रूप ले लेती है, लेकिन यह कोई ऊपरी मुकाबला नहीं है. यह सेल्फ-रिस्पेक्ट और इमोशनल संघर्ष पर ज्यादा जोर देती है. फिल्म खूबसूरती से यह मैसेज देती है कि ‘प्यार सिर्फ साथ रहने के बारे में नहीं है, यह एक-दूसरे को समय देने, समझने और महसूस करने के बारे में है.’ आज के डिजिटल जमाने में जहां रिश्ते ‘राइट स्वाइप’ से शुरू होते हैं, यह फिल्म हमें रुकने और यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम सच में अपने पार्टनर को समझते हैं.
एक्टिंग
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत जतिन सरना हैं. ‘सेक्रेड गेम्स’ में ‘बंटी’ के रोल में मशहूर जतिन की ‘कुशाल’ के रोल में सेंसिटिविटी कमाल की है. उनकी परफॉर्मेंस चिल्लाने या ड्रामैटिक सीन से नहीं, बल्कि उनकी आंखों में नमी और डायलॉग के बीच की खामोशी से है. कुशाल एक ऐसा आदमी है जो अंदर से टूटा हुआ है, अपनी गलतियों के बोझ तले दबा है, फिर भी वह स्ट्रगल करता है. जतिन ने जिस तरह से एक लवर के दर्द, कन्फ्यूजन और दुविधा को जिया है, वह उन्हें इस दौर के सबसे असरदार एक्टर में से एक बनाता है. वहीं, मधुरिमा रॉय ने दिल और दिमाग के बीच फंसी एक औरत का रोल किया है. उनकी स्क्रीन प्रेजेंस फिल्म में एक फ्रेशनेस लाती है. प्रणय पचौरी भी अपने मॉडर्न और कॉन्फिडेंट कैरेक्टर के साथ पूरा न्याय करते हैं. जतिन और प्रणय के बीच के सीन फिल्म के सबसे हाई पॉइंट हैं.
डायरेक्शन
डायरेक्टर विकास अरोड़ा कहानी को मेलोड्रामा बनने से बचाने के लिए तारीफ के काबिल हैं. वह आज के युवाओं के रिश्तों को जजमेंट के पैमाने पर नहीं तौलते, बल्कि उन्हें वैसे ही दिखाते हैं जैसे वे हैं- कन्फ्यूज्ड और अधूरे. फिल्म के डायलॉग दिल को छू जाते हैं. फिल्म सादगी और सच्चाई पर आधारित है. वहीं, फिल्म का म्यूजिक, खासकर टाइटल ट्रैक ‘ना जाने कौन आ गया,’ कहानी के मूड को और गहरा करता है. यह गाना न सिर्फ सुनने में सुरीला है, बल्कि कहानी के इमोशनल उतार-चढ़ाव को भी सपोर्ट करता है.
सिनेमैटोग्राफी
फिल्म की विजुअल अपील इसकी सादगी में है. सिनेमैटोग्राफर ने कलर और लाइटिंग का बहुत समझदारी से इस्तेमाल किया है. जतिन सरना के अकेलेपन और टूटेपन को दिखाने में लो-लाइट और शैडो का इस्तेमाल असरदार है. एक्टर्स के चेहरे के एक्सप्रेशन को कैप्चर करने के लिए बेहतरीन क्लोज-अप का इस्तेमाल किया गया है, जो दर्शकों को किरदारों के अंदर के दर्द से जोड़ता है.
कमियां
कोई भी फिल्म कितनी भी अच्छी क्यों न हों, कमियां तो सब में होती ही हैं. ‘ना जाने कौन आ गया’ में भी कुछ ऐसी जगहें हैं जहां फिल्म थोड़ी कमजोर पड़ती है. फिल्म का दूसरा भाग कुछ जगहों पर काफी धीमा हो जाता है. कुछ दृश्यों को और ज्यादा चुस्त तरीके से एडिट किया जा सकता था. हालांकि फिल्म गहरे मुद्दों को छूती है, लेकिन ‘लव ट्रायंगल’ के कुछ हिस्से ऐसे हैं जो दर्शक पहले से ही भांप लेते हैं. कहानी में कुछ और सरप्राइज एलिमेंट्स की कमी खलती है. मुख्य कलाकारों के अलावा अन्य किरदारों को उतनी गहराई नहीं दी गई है, जिससे कुछ दृश्यों में फिल्म का प्रभाव केवल जतिन और मधुरिमा के कंधों पर ही टिका रहता है.
अंतिम फैसला
‘ना जाने कौन आ गया’ एक ऐसी फिल्म है जिसे सिर्फ देखा नहीं, बल्कि महसूस किया जाना चाहिए. यह फिल्म हमें याद दिलाती है कि प्यार करना आसान है, लेकिन प्यार निभाना एक जिम्मेदारी है. जतिन सरना की बेजोड़ परफॉर्मेंस और विकास अरोड़ा के संवेदनशील निर्देशन के लिए यह फिल्म हर उस शख्स को देखनी चाहिए जो रिश्तों की जटिलताओं को समझना चाहता है. मेरी ओर से फिल्म को 5 में से 3 स्टार.
