Last Updated:
‘किस्सा कोर्ट कचहरी का’ फिल्म रिव्यू: अक्सर लीगल फिल्में कोर्टरूम ड्रामा और भारी-भरकम डायलॉग तक ही सीमित रह जाती हैं, लेकिन डायरेक्टर रजनीश जायसवाल की ‘किस्सा कोर्ट कचहरी का’ कोर्ट की फाइलों के पीछे छिपे कड़वे सच को सामने लाती है. एक्टर राजेश शर्मा और बृजेंद्र काला की शानदार एक्टिंग वाली यह फिल्म सिर्फ एक कहानी नहीं, बल्कि समाज के लिए एक जरूरी मैसेज है. यह उन परिवारों के दर्द और संघर्ष को दिखाती है जिनके लिए इंसाफ का रास्ता किसी अग्नि परीक्षा से कम नहीं है.

राजेश शर्मा और बृजेंद्र काला स्टारर ‘किस्सा कोर्ट कचहरी का’ 13 मार्च को होगी रिलीज.
किस्सा कोर्ट कचहरी का 3
Starring: बृजेंद्र काला, राजेंद्र शर्मा, अंजू जाधव, जितेंद्र यादव, अगस्त आनंद, कृष्ण सिंह बिष्ट और अन्यDirector: रजनीश जायसवालMusic: प्रवेश मलिक
नई दिल्ली. बॉलीवुड फिल्मों में कोर्टरूम को अक्सर भारी डायलॉग और ड्रामैटिक ट्विस्ट से भरे स्टेज की तरह दिखाया जाता है, लेकिन लवली फिल्म्स प्राइवेट लिमिटेड के बैनर तले बनी ‘किस्सा कोर्ट कचेरी का’ इस घिसे-पिटे पैटर्न को तोड़ती है. प्रोड्यूसर अरुण कुमार ने कमर्शियल प्रॉफिट के चक्कर से आगे बढ़कर एक ऐसी कहानी बताई है जो समाज के उन जख्मों को दिखाती है जिन्हें अक्सर ‘तारीख पर तारीख’ के शोर में दबा दिया जाता है.
फिल्म की कहानी किसी एक इंसान के बारे में नहीं है, बल्कि उस सिस्टम के बारे में है जो इंसाफ के नाम पर आम आदमी का दम घोंटता है. यह अनगिनत लोगों की कहानी है जो कोर्टरूम में मेहनत करते-करते बूढ़े हो जाते हैं, फिर भी इंसाफ की दहलीज तक कभी नहीं पहुंच पाते. कहानी एक मुश्किल कानूनी केस पर बेस्ड है, लेकिन राइटर और डायरेक्टर ने इसे सिर्फ ‘सेक्शन’ और ‘कानून की किताबों’ तक सीमित नहीं रखा है.
एक्टिंग
एक्टिंग की बात करें तो अपनी दमदार प्रेजेंस और आंखों की गहराई से, राजेश शर्मा फिल्म को एक मजबूत बेस देते हैं. उनकी परफॉर्मेंस नेचुरल लगती. वह पूरी तरह से कैरेक्टर में घूसे नजर आते हैं. वहीं बृजेंद्र काला की एक्टिंग की सबसे बड़ी खूबी है उनकी सादगी. उन्होंने एक बार फिर साबित कर दिया कि बिना किसी लाउड एक्टिंग के भी दर्शकों के दिल में जगह बनाई जा सकती है. नीलू कोहली की प्यार भरी सेंसिटिविटी दिल को छू जाती है. सुशील चंद्रभान की ताकत और कृष्णा सिंह बिष्ट का सुलझा हुआ स्टाइल कहानी में गहराई लाते हैं. अंजू जाधव, संजीव जायसवाल और लोकेश तिलकधारी ने अपने किरदारों के साथ इंसाफ किया है.
डायरेक्शन
डायरेक्टर रजनीश जायसवाल यहां सिर्फ कैमरा ही नहीं चलाते, बल्कि उन्होंने भावनाओं को एक आर्ट वर्क में ढाला है. एक डायरेक्टर के तौर पर उनकी सबसे बड़ी कामयाबी फिल्म में चुप्पी का उनका शानदार इस्तेमाल है. कोर्टरूम ड्रामा में अक्सर चिल्लाते वकील और मेज थपथपाते जज होते हैं, लेकिन जायसवाल इसे रियलिस्टिक रखते हैं. वह कोर्टरूम की बोरियत और शांत गंभीरता को पकड़ते हैं, जो सच में भारतीय अदालतों की पहचान है.
सिनेमैटोग्राफी और म्यूजिक
सिनेमैटोग्राफी की बात करें तो धर्मेश बिस्वास के लेंस ने कोर्ट रूम के घुटन भरे माहौल, फाइलों पर जमी धूल और सीलन भरी दीवारों को अच्छे से दिखाया है, जो जस्टिस सिस्टम की सुस्ती को दिखाते हैं. उनके फ्रेम में रंगों का चुनाव कहानी के मूड के हिसाब से एकदम सही है. वहीं, प्रवेश मलिक का म्यूजिक फिल्म की जान है. बैकग्राउंड स्कोर फिल्म के टेंशन और इमोशंस को और बढ़ाता है.
कमियां
कोई भी फिल्म परफेक्ट नहीं होती और ‘किस्सा कोर्ट कचेरी का’ में भी कुछ कमियां नजर आती हैं. इसमें कोई शक नहीं कि फिल्म का रियलिस्टिक नेचर एक ताकत है, लेकिन कहानी की रफ्तार कई बार काफी धीमी हो जाती है. तेज-तर्रार एंटरटेनमेंट के आदी दर्शकों को कुछ सीन थोड़े लंबे लग सकते हैं. फिल्म इतनी गंभीर और कड़वी सच्चाइयों से भरी है कि इसमें हल्के-फुल्के पलों की बहुत कमी है. वहीं, कमर्शियल सिनेमा के हिसाब से यह कुछ दर्शकों के लिए बहुत हैवी हो सकती है. यह फिल्म सिर्फ उन लोगों को पसंद आएगी जो मीनिंगफुल और इनसाइटफुल सिनेमा पसंद करते हैं. मसाला फिल्मों के फैन निराश हो सकते हैं.
अंतिम फैसला
‘किस्सा कोर्ट कचहरी का’ सिर्फ एक फिल्म नहीं है, बल्कि सिस्टम पर एक तीखा हमला है. जैसा कि मैंने ऊपर कहा कि अगर मीनिंगफुल और इनसाइटफुल सिनेमा पसंद करते हैं, तो यह आपको आपको पसंद आ सकती है, लेकिन मसाला फिल्मों के शौकीनों के लिए यह जरूर निराश करेगी. मेरी ओर से फिल्म को 5 में से 3 स्टार.
About the Author

Pratik Shekhar is leading the entertainment section in News18 Hindi. He has been working in digital media for the last 12 years. After studying from Makhanlal Chaturvedi National University of Journalism and Co…और पढ़ें
