March 17, 2026
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श्रीकृष्ण ने द्वारका में शरीर त्याग किया था तो उनका हृदय जगन्नाथ पुरी कैसे गया

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हर किसी के मन में सवाल तो रहता है कि आखिर श्रीकृष्ण ने द्वारका में शरीर त्याग कर दिया था तो उनका हृदय आखिर जगन्नाथ पुरी कैसे पहुंच गया. यह कोई पौराणिक कथा नहीं बल्कि जिज्ञासा है, जो काल, भूगोल और आस्था की कहानी को जोड़ता है. तो चलिए आइए जानते हैं आखिर भगवान श्रीकृष्ण का हृदय जगन्नाथ पुरी धाम कैसे पहुंचा…

पौराणिक कथाओं के अनुसार, गांधारी का श्राप और बहेलिए के तीर लगने से भगवान श्रीकृष्ण ने शरीर का त्याग कर दिया था. श्रीकृष्ण की कहानी शरीर के त्यागने के साथ खत्म नहीं हुई. असल में उनके शरीर त्यागने के बाद यह और भी रहस्यमयी, गहरी और शक्तिशाली हो जाती है. असल कहानी तो उसके बाद शुरू होती है और पूरा विश्व इसका गवाह बनता है. भगवान द्वारका में अपना शरीर त्याग देते हैं, उसके बाद वह शहर समुद्र में डूब जाता है. लेकिन भारत के पूर्वी तट पर एक मंदिर बनता है, जहां लोग मानते हैं कि कृष्णजी आज भी जीवित हैं, वहां आज भी अनुष्ठानों के जरिए सांस ले रहे हैं, बिना मानवीय रूप के भी मौजूद हैं. अगर श्रीकृष्ण ने सच में द्वारका में शरीर त्याग कर दिया था तो फिर जगन्नाथ मंदिर ऐसा क्यों लगता है जैसे वे कभी गए ही नहीं? यह सिर्फ कोई कथा नहीं है बल्कि एक जिज्ञासा भी है. यह घटनाओं की एक ऐसी कड़ी है, जो समय, भूगोल, शास्त्र और आस्था को एक सतत कहानी में जोड़ती है. आइए जानते हैं इसके पीछे की वजह…

परंपरागत हिंदू कालक्रम के अनुसार, श्रीकृष्ण ने 3102 ईसा पूर्व, भाद्रपद माह की अमावस्या को अपना नश्वर शरीर त्याग दिया था. माना जाता है कि इसी क्षण द्वापर युग का अंत और कलियुग की शुरुआत हो गई थी. शास्त्रों में इसे कोई दुर्घटना या हार नहीं बल्कि एक सचेत वापसी बताया गया है. भगवान कृष्ण ने पृथ्वी पर अपना कर्तव्य पूरा कर लिया था. जिस संतुलन को वे स्थापित करने आए थे, वह स्थापित हो चुका था. उनका जाना इस बात का संकेत था कि अब मानवता को बिना प्रत्यक्ष दैवीय हस्तक्षेप के आगे बढ़ना होगा.

पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण द्वारका के पास एक जंगल में विश्राम कर रहे थे, जब जरा नामक एक शिकारी ने उनके पैर के तलवे को हिरण समझकर तीर चला दिया. अक्सर यह बात अनदेखी रह जाती है कि श्रीकृष्ण ने भाग्य का विरोध नहीं किया. वह चाहते तो इस घटना को अपने हिसाब से मोड सकते हैं लेकिन उन्होंने शिकारी को तुरंत क्षमा कर दिया. ग्रंथों में इस क्षमा को खास तौर पर रेखांकित किया गया है. तीर ने कृष्ण को नहीं मारा, काल ने मारा. यह घटना उनके पूर्व जन्म से जुड़े एक श्राप की पूर्ति थी, जिससे यह संदेश मिलता है कि ब्रह्मांड का नियम पृथ्वी पर मौजूद सभी देवी-देवताओं पर भी लागू होता है.

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अर्जुन के लिए यह क्षण कुरुक्षेत्र से भी भारी था. उनके सामने कुछ ऐसा पवित्र था, जिसे ना जलाया जा सकता था, ना दफनाया और ना ही रखा जा सकता था. अर्जुन ने स्वामित्व की जगह समर्पण चुना और कृष्णजी के हृदय को समुद्र में प्रवाहित कर दिया. यह कृत्य गहरा प्रतीकात्मक था. इसका अर्थ था कि अब श्रीकृष्ण किसी एक व्यक्ति, परिवार या नगर के नहीं रहे. आगे जो होना था, वह मनुष्यों के वश में नहीं था.

श्रीकृष्ण के प्रस्थान के तुरंत बाद, द्वारका के समुद्र में डूबने की बात कही जाती है. प्राचीन ग्रंथों में समुद्र द्वारा शहर को पत्थर-पत्थर निगलने का वर्णन है. आधुनिक काल में द्वारका के पास समुद्र के नीचे मिले अवशेषों ने इस विश्वास को और मजबूत किया है. भक्तों के लिए इसका अर्थ सीधा और गहरा है. द्वारका इसलिए थी क्योंकि कृष्ण वहां थे. उनके जाने के बाद शहर का उद्देश्य पूरा हो गया.

ओडिशा में भव्य मंदिर बनने से बहुत पहले, आदिवासी परंपराओं में एक रहस्यमय दिव्य काष्ठ रूप ‘दारु ब्रह्म’ के तट पर मिलने की कथा थी. कहा जाता था कि उसमें अद्भुत शक्ति थी और उसे सामान्य तरीके से आकार नहीं दिया जा सकता था. समय के साथ यह विश्वास वैदिक परंपराओं में घुलमिल गया और जगन्नाथ उपासना का रूप ले लिया. कई लोग मानते हैं कि समुद्र ने कृष्णजी की अमर चेतना को द्वारका से इन तटों तक पहुंचाया, जिससे उनकी उपस्थिति नए रूप में जारी रही.

भगवान जगन्नाथ के ना तो स्पष्ट हाथ हैं और ना ही पैर. उनका रूप जानबूझकर अधूरा है. यह कोई कलात्मक कमी नहीं बल्कि दर्शन है. कृष्णजी अब न द्वारका के राजा के रूप में दिखते हैं, ना अर्जुन के सारथी के रूप में. भगवान जगन्नाथ में वे निराकार उपस्थिति बन जाते हैं, जो सबके लिए सुलभ है, जाति, शरीर और भूगोल से परे. द्वारका उनके जीवन की याद है. जगन्नाथ वह है, जो कभी मर नहीं सकता.



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