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शंकर-जयकिशन कभी बॉलीवुड की पहचान हुआ करते थे. उनकी बनाई धुनें सिर्फ गाने नहीं, एक दौर की आवाज थीं. नाम ऐसा कि निर्माता आंख बंद करके फिल्म सौंप दें और फीस लाखों में तय हो. लेकिन हर चमक के पीछे एक साया भी होता है. इस जोड़ी की कहानी में भी दोस्ती, भरोसा और बदलते वक्त की ऐसी परतें छिपी हैं, जिसने सब कुछ बदल दिया. कैसे बनी ये जोड़ी और फिर क्यों बिखर गई…यही किस्सा सबसे ज्यादा चौंकाने वाला है.

नई दिल्ली. ‘आवारा हूं’ की धुन हो, ‘मेरा जूता है जापानी’ का जोश या ‘ये मेरा प्रेम पत्र पढ़कर’ जैसी मोहब्बत भरी मेलोडी… इन गीतों के पीछे एक ऐसी जोड़ी थी, जिसने हिंदी सिनेमा के संगीत को नई पहचान दी. शंकर-जयकिशन का नाम आते ही एक सुनहरा दौर याद आता है, जब हर फिल्म का संगीत चार्टबस्टर बन जाता था और थिएटर से लेकर गलियों तक उनकी धुनें गूंजती थीं. कभी उनकी धुनों की कीमत लाखों में आंकी जाती थी और बड़े-बड़े निर्माता उनके नाम पर फिल्में खरीद लेते थे. लेकिन इस चमकदार सफलता के पीछे एक ऐसी कहानी भी छिपी है, जिसमें दोस्ती, वादे और टूटते भरोसे की कसक है. वक्त के साथ हालात बदले और उसी जोड़ी का सफर ऐसे मोड़ पर पहुंचा, जिसने हर किसी को चौंका दिया. आखिर कैसे बनी और फिर बिखर गई ये आइकॉनिक जोड़ी. यही कहानी है जितनी शानदार, उतनी ही दर्दभरी.

पहलवानी के शौकीन और कड़े अनुशासन वाले शंकर सिंह रघुवंशी जब बंबई (मुंबई) के पृथ्वी थियेटर पहुंचे तो उनकी मुलाकात गुजरात के एक युवा हारमोनियम वादक जयकिशन से हुई. शंकर सिंह रघुवंशी ने उसकी प्रतिभा पहचानी और उसे भी काम दिला दिया. किस्मत का पहिया तब घूमा, जब राज कपूर अपनी फिल्म ‘बरसात’ (1949) के लिए संगीतकार खोज रहे थे.

शंकर ने एक धुन सुनाई, जो राज कपूर को बेहद पसंद आई. राज कपूर ने शंकर को फिल्म का संगीतकार बना दिया, लेकिन शंकर ने एक बड़ी शर्त रखी थी, ‘मेरे युवा दोस्त जयकिशन को भी मेरे बराबर का संगीतकार (पार्टनर) बनाना होगा.’ राज कपूर मान गए और यहीं से जन्म हुआ उस जोड़ी का, जिसने अगले 22 साल तक बॉलीवुड पर एकछत्र राज किया.
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उन्होंने फिल्म संगीत का व्याकरण ही बदल दिया. ‘आवारा’, ‘श्री 420’, ‘चोरी-चोरी’ और ‘संगम’ जैसी फिल्मों ने सफलता के ऐसे झंडे गाड़े कि शंकर-जयकिशन को एक फिल्म के 5 लाख रुपए मिलने लगे, जो कई बार हीरो की फीस से भी ज्यादा होते थे.

कहा जाता है कि 1960 के दशक के मध्य तक आते-आते जब जयकिशन ने एक मैगजीन में दावा कर दिया कि ‘संगम’ का अमर गीत ‘ये मेरा प्रेम पत्र पढ़कर’ अकेले उनकी रचना है. शंकर और जयकिशन ने कभी किसी को न बताने की कसम खाई थी कि कौन सी धुन किसने बनाई है. इस खुलासे से शंकर का दिल टूट गया.

12 सितंबर 1971 को जयकिशन का निधन हो गया. इससे पहले शंकर अपने सबसे अजीज दोस्त और गीतकार शैलेन्द्र को भी खो चुके थे. जयकिशन की मौत के बाद कल तक जो लोग शंकर-जयकिशन के नाम पर फिल्में खरीदते थे, उन्होंने कहना शुरू कर दिया कि धुनें तो सिर्फ जयकिशन बनाते थे. सबसे बड़ा धोखा मिला 22 साल के साथी राज कपूर से.

राज कपूर ने अपनी अगली फिल्म ‘बॉबी’ के लिए शंकर को छोड़कर लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल को साइन कर लिया. लेकिन 1975 में उन्होंने मनोज कुमार की फिल्म ‘संन्यासी’ में अकेले इतना जबरदस्त संगीत दिया कि पूरा देश ‘चल संन्यासी मंदिर में’ पर झूम उठा.

1980 का दशक आते-आते सिंथेसाइजर और डिस्को का दौर आ गया. बड़े निर्माताओं ने शंकर से मुंह मोड़ लिया. इसी दौरान उनके पुराने दिनों का एक संघर्षशील साथी, सुधाकर शर्मा, अपनी फिल्म ‘गोरी’ के लिए शंकर के पास 21,000 रुपए लेकर आया. शंकर ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘जो लड़का कभी मुझे स्टूडियो में कॉफी पिलाता था, आज मुझे काम दे रहा है.’ शंकर ने वो पैसे लौटा दिए और महज 1 रुपए के शगुन पर धुन बनाई.

हैदराबाद में 15 अक्टूबर, 1922 को जन्मे शंकर सिंह रघुवंशी हमेशा शराब से दूर रहे. रोज कसरत करने वाले इस अनुशासित इंसान को 26 अप्रैल, 1987 को अचानक दिल का दौरा पड़ा और वे इस दुनिया को छोड़ चले.
