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Bollywood Movies on Same Story Line : कुछ फिल्में इतनी रोचक होती हैं कि समय-काल के बंधन को तोड़ देती है. ये कालजयी फिल्में दर्शकों के दिल-दिमाग में बस जाती हैं. जैसे-जैसे समय बीतता जाता है कि इन फिल्मों में दिखाई गई कहानी और असरदार होती जाती है. ऐसी फिल्मों को बार-बार देखने के बाद भी मन नहीं भरता. बॉलीवुड में 33 साल के अंतराल में ऐसी ही एक कहानी पर चार बार फिल्में बनाई गईं. चारों ही फिल्में इतनी मार्मिक थी कि सिनेमाघरों में दर्शक खूब रोए. चारों फिल्में बॉक्स ऑफिस पर सुपरहिट रहीं.

कहानी रोचक-मार्मिक हो और अगर उसे कहने का अंदाज नया हो तो एक ही स्टोरी पर कई बार फिल्म बनाई जा सकती है. बॉलीवुड ने इसे कई बार साबित किया है. 33 साल के लंबे अंतराल में पांच ऐसी फिल्में सिनेमाघरों में आईं जिनकी कहानी सेम-सेम बट डिफरेंट थी. पांचों ही फिल्में ड्रामा वाली थीं. सिनेमाघरों में अलग-अलग समय में आईं इन फिल्मों की कहानी इतनी मार्मिक ढंग से प्रस्तुत की गई कि दर्शक भी खूब रोए. सभी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर सुपरहिट रहीं. ये फिल्में थीं : मेहरबान, अवतार, स्वर्ग और बागवान. चारों फिल्मों की कहानी एक जैसी है.

सबसे पहले बात करते हैं ए. भीम सिंह के निर्देशन में बनी ‘मेहरबान’ फिल्म की. 21 अप्रैल 1967 को रिलीज ‘मेहरबान’ फिल्म में अशोक कुमार, सुनील दत्त और नूतन नजर लीड रोल में थे. महमूद और शशिकला भी फिल्म में अहम भूमिकाओं में थे. अशोक कुमार ने बड़े कारोबारी शांति स्वरूप का रोल निभाया था. शेयर बाजार डूब जाने से वो रातोंरात गरीब हो जाते हैं. गरीबी में उनके अपने बेटे भी साथ नहीं देते. फिल्म में सुनील दत्त ने शांति स्वरूप के भांजे का किरदार निभाया था. वो अपने मामा के सपने को नहीं भुला पाते. अपने मामा के बेटों से बदला लेते हैं. बाद में पूरा परिवार एकजुट हो जाता है. ‘मेहरबान’ फिल्म प्रसिद्ध बंगाली लेखिका आशापूर्णा देवी के उपन्यास ‘जोग बियोग’ (जोड़ और घटाव) पर बेस्ड थी जिसे 1953 में कलकत्ता बुक क्लब ने प्रकाशित किया था. 1960 में इसी उपन्यास की कहानी पर राइटर ए. भीम सिंह ने एक तमिल फिल्म बनाई. 1962 में एक तेलुगू फिल्म भी इसी कहानी पर आई. बाद में ए. भीम सिंह ने मेहरबान फिल्म बनाई. आशापूर्णा देवी के उपन्यास ‘जोग बियोग’ पर बॉलीवुड में कई और फिल्में बनाई गईं.

‘मेहरबान’ फिल्म प्रसिद्ध बंगाली लेखिका आशापूर्णा देवी के उपन्यास ‘जोग बियोग’ (जोड़ और घटाव) पर बेस्ड थी जिसे 1953 में कलकत्ता बुक क्लब ने प्रकाशित किया था. 1960 में इसी उपन्यास की कहानी पर राइटर ए. भीम सिंह ने एक तमिल फिल्म बनाई. 1962 में एक तेलुगू फिल्म भी इसी कहानी पर आई. बाद में ए. भीम सिंह ने मेहरबान फिल्म बनाई. आशापूर्णा देवी के उपन्यास ‘जोग बियोग’ पर बॉलीवुड में कई और फिल्में बनाई गईं.
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‘मेहरबान’ ने कई और फिल्मों का कथानक तैयार किया. प्रोड्यूसर-डायरेक्टर मोहन कुमार ने इसी कथानक पर एक फिल्म ‘अवतार’ बनाई जिसमें राजेश खन्ना और शबाना आजमी लीड रोल में थे. अवतार फिल्म की 1983 में आई थी. इस फिल्म की कहानी का मूल आधार ‘जोग बियोग’ उपन्यास ही था. मूल कहानी के स्वरूप में बदलाव करके मोहन कुमार ने स्क्रीनप्ले लिखा था. फिल्म के मशहूर डायलॉग मुश्ताक जलीली की कलम से निकले थे. संगीतकार लक्ष्मीकांत प्यारेलाल की धुनों को गीतों में गीतकार आनंद बख्शी ने पिरोया था. ‘अवतार’ फिल्म सुपरहिट रही. 1980 के दशक में कई पारिवारिक फिल्में की फाउंडेशन ‘अवतार’ ने ही रखी थी.

‘अवतार’ फिल्म का म्यूजिक सुपरहिट रहा था. ‘हम प्यार में जीते, प्यार में मरते जाएंगे, देखेंगे, देख लेना…, ‘चलो बुलावा आया है, माता ने बुलाया है’ जैसे गाने आज भी सुने जाते हैं. ‘चलो बुलावा आया है, माता ने बुलाया है’ गाना हर साल नवरात्र में बजता है. वैष्णो देवी में इस गाने की शूटिंग पूरे चार दिन चली थी. अवतार फिल्म से राजेश खन्ना ने अपना खोया हुआ स्टारडम दोबारा पाने की कोशिश की. बताया जाता है कि ‘अवतार’ फिल्म का टाइटल पहले ‘राधा’ था जिसे राजेश खन्ना के किरदार के नाम अवतार किशन से प्रेरित होकर बदला गया था. इस फिल्म का भारतीय समाज पर गहरा प्रभाव पड़ा. गुलशन कुमार को इस फिल्म से बहुत फायदा हुआ. 1976 में संजीव कुमार की ‘जिंदगी’ फिल्म में भी इसी तरह स्टोरी लाइन थी.

‘अवतार’ फिल्म के रिलीज होने के 7 साल बाद 18 मई 1990 को ‘स्वर्ग’ मूवी रिलीज हुई. इसकी कहानी भी ‘अवतार’ फिल्म से मिलती-जुलती थी. अनीस बज्मी की कहानी-स्क्रीनप्ले को रुपहले पर्दे पर डेविड धवन ने उतारा. राजेश खन्ना-गोविंदा स्टारर ‘स्वर्ग’ मूवी 1967 में आई ‘मेहरबान’ से बहुत ज्यादा इंस्पायर थी. डेविड धवन की गोविंदा के साथ यह पहली हिट फिल्म थी. राजेश खन्ना की आखिरी हिट फिल्म थी. ‘स्वर्ग’ फिल्म को पाकिस्तानी मूवी ‘साहिब जी’ का रीमेक बताया जाता है. दोनों फिल्मों के डायलॉग भी बहुत हद तक सेम थे.

‘स्वर्ग’ फिल्म सिर्फ छह माह में बनकर तैयार हुई थी. फिल्म दिसंबर 1989 में रिलीज होनी थी लेकिन बाद में इसे मई 1990 में सिनेमाघरों में रिलीज किया गया. यह गोविंदा की राजेश खन्ना के साथ पहली फिल्म थी. फिल्म का सुपरहिट म्यूजिक आनंद-मिलिंद ने कंपोज किया था. फिल्म में कुल 5 गाने रखे थे जिसमे से ‘ऐ मेरे दोस्त लौट के आजा, बिन तेरे जिंदगी अधूरी है..’ ‘फिल्मों के सारे हीरो, मेरे आगे जीरो.. तुम सजना के घर जाओगे, हमें याद बहुत आओगे… कैसे कटे दिन, कैसे कटी रातें..’ खूब पॉप्युलर हुए.

2000 का दशक शुरू हुआ. जमाना तेजी से बदला. हिंदी सिनेमा में भी तेजी से बदलाव आया. फिल्मों को बनाने का पैटर्न बदला. ऐसे बदलते माहौल मे सिनेमाघरों में 2003 में अमिताभ बच्चन-हेमा मालिनी स्टारर फिल्म ‘बागवान’ आई थी. ज्यादातर फिल्म समीक्षकों ने फिल्म की स्टोरी को पुराना बताया. शुरुआती के चार दिन तक थिएटर्स बिल्कुल सूने रहे. फिर ऐसा चमत्कार हुआ कि फिल्म सुपरहिट साबित हुई. ‘बागवान’ फिल्म के डायरेक्टर रवि चोपड़ा थे. स्टोरी बीआर चोपड़ा ने लिखी थी. प्रोड्यूसर बीआर चोपड़ा ही थे. अमिताभ बच्चन-हेमा मालिनी की जोड़ी, उनके डायलॉग, उनकी केमिस्ट्री देखकर दर्शक रोमांचित हो गए थे.

फिल्म का स्क्रीनप्ले बीआर चोपड़ा, अचला नागर, सतीश भटनागर, राम गोविंद, शफीक अंसारी और सलीम-जावेद ने लिखा था. लंबे समय बाद सलीम-जावेद की जोड़ी साथ आई थी. फिल्म में सलमान खान ने छोटा सा लेकिन पावरफुल रोल किया. पूरी मूवी को डूबने से बचाया. यह फिल्म थी ‘मेहरबान’, ‘स्वर्ग’ जैसी फिल्मों से प्रेरित थी. रवि चोपड़ा की पत्नी रेनू चोपड़ा ने एक इंटरव्यू में बताया था कि सलमान खान ने स्क्रिप्ट सुनते ही हामी भर दी थी. सलमान खान अपनी निजी जिंदगी में अपने पैरेंट्स को बहुत प्यार करते हैं, उनकी इज्जत करते हैं, इसलिए उन्होंने यह छोटी सी भूमिका निभाई. फिल्म के लास्ट में अमिताभ बच्चन ने जो स्पीच दी, उसने दर्शकों को सिनेमाघरों में रोने के लिए मजबूर कर दिया था. 10 करोड़ के बजट में बनी ‘बागबान’ फिल्म ने वर्ल्डवाइड 43 करोड़ से ज्यादा का कलेक्शन किया था. वैसे ‘बागवान’ फिल्म 1976 में रिलीज हुई संजीव कुमार की फिल्म ‘जिंदगी’ की कॉपी थी. फिल्म के सीन-डायलॉग हूबहू मैच करते हैं. दिलचस्प बात यह है कि ‘जिंदगी’ फिल्म फ्लॉप हो गई थी.
