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Gangaur Vrat 2026 Today: आज देशभर में गणगौर पूजा की जाएगी. गणगौर का यह पावन पर्व महिलाओं की आस्था, प्रेम और समर्पण का प्रतीक है, जो भारतीय संस्कृति की समृद्ध परंपराओं को जीवंत बनाए रखता है. इस व्रत की खास बात यह है कि इस व्रत को महिलाएं पति से छिपाकर करती हैं और व्रत का भोग भी पुरुषों को नहीं मिलता है. आइए जानते हैं गणगौर पूजा का महत्व, पूजा विधि, शुभ मुहूर्त और महिलाएं पति से छिपाकर क्यों रखती हैं यह व्रत…

Gangaur Vrat 2026 Today: राजस्थान सहित देश के कई हिस्सों में आज आस्था और परंपरा का विशेष पर्व गणगौर श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है. हर वर्ष यह पर्व चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है. वैसे तो होली के अगले दिन से ही व्रत की शुरुआत हो जाती है लेकिन चैत्र की तृतीया तिथि का दिन खास माना जाता है क्योंकि इस व्रत का समापन और विसर्जन होता है. यह पर्व मुख्य रूप से महिलाओं का त्योहार माना जाता है, जिसमें वे अखंड सौभाग्य, पति की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना करती हैं. अविवाहित कन्याएं भी अच्छे वर की प्राप्ति के लिए यह व्रत रखती हैं. गणगौर पूजा का संबंध माता गौरी (पार्वती) और भगवान शिव से जुड़ा हुआ है. आइए जानते हैं गणगौर पूजा का महत्व, पूजा विधि, शुभ मुहूर्त और महिलाएं पति से छिपाकर क्यों रखती हैं यह व्रत…
क्या है गणगौर का महत्व?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गणगौर का व्रत माता गौरी ने भगवान शिव के लिए रखा था था, इसलिए यह व्रत को वैवाहिक सुख का प्रतीक माना जाता है. इस व्रत की अनोखी बात यह है कि इस व्रत को महिलाएं पति से छिपाकर करती हैं. यह व्रत महिलाओं के जीवन में सुख, समृद्धि और वैवाहिक स्थिरता लाता है. खासकर राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर भारत के कुछ क्षेत्रों में यह पर्व बड़े उत्साह से मनाया जाता है. इस दिन महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में सोलह श्रृंगार कर माता गौरी की पूजा करती हैं. मान्यता है कि इस व्रत और पूजा अर्चना करने से भगवान शिव और माता पार्वती की कृपा प्राप्त होती है और वे भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरा करती हैं. गणगौर के प्रसाद का भी विशेष महत्व है, भोग के रूप में राजस्थान में इस दिन गुने बनाए जाते हैं.
गणगौर पूजा मुहूर्त 2026
ब्रह्म मुहूर्त: 04:49 ए एम से 05:37 ए एम
अभिजित मुहूर्त: 12:04 पी एम से 12:53 पी एम
विजय मुहूर्त: 02:30 पी एम से 03:18 पी एम
गणगौर पूजा विधि क्या है?
गणगौर पूजा में महिलाएं सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करती हैं. इसके बाद चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर मिट्टी या लकड़ी की गणगौर (शिव-पार्वती) की प्रतिमा स्थापित की जाती है. विधिपूर्वक पूजा कर जल, फूल, अक्षत, सिंदूर आदि अर्पित किया जाता है. इसके बाद सुहाग का सामान जैसे सिंदूर, चुनरी, चूड़ी, मेहंदी और प्रसाद अर्पित किया जाता है. कई स्थानों पर महिलाएं लोकगीत गाते हुए जल से भरे घड़े लेकर शोभायात्रा भी निकालती हैं. व्रत रखने वाली महिलाएं दिनभर निर्जला या फलाहार व्रत रखती हैं और शाम को कथा सुनने के बाद महिलाएं गाते-बजाते हुए किसी पवित्र नदी पर जाकर प्रतिमा का विसर्जन करती हैं. पूजा के दौरान पारंपरिक गीत और नृत्य भी इस पर्व की विशेष पहचान हैं.
पति से छिपाकर व्रत रखने की परंपरा क्यों?
गणगौर से जुड़ी एक रोचक परंपरा यह भी है कि कुछ क्षेत्रों में महिलाएं यह व्रत अपने पति से छिपाकर रखती हैं. मान्यता है कि अगर व्रत का प्रदर्शन या दिखावा किया जाए तो उसका पूर्ण फल नहीं मिलता. इसलिए इसे गुप्त रूप से करने की परंपरा चली आ रही है, ताकि व्रत का पूर्ण फल प्राप्त हो सके. इसके अलावा, एक लोककथा के अनुसार माता गौरी ने भी जब यह व्रत भगवान शिव के लिए रखा था, तब शिवजी को भी नहीं बताया था इसलिए महिलाएं पति से छिपाकर यह व्रत करती है. साथ ही गणगौर पूजा का प्रसाद भी पुरुषों को नहीं दिया जाता.
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पराग शर्मा एक अनुभवी धर्म एवं ज्योतिष पत्रकार हैं, जिन्हें भारतीय धार्मिक परंपराओं, ज्योतिष शास्त्र, मेदनी ज्योतिष, वैदिक शास्त्रों और ज्योतिषीय विज्ञान पर गहन अध्ययन और लेखन का 12+ वर्षों का व्यावहारिक अनुभव ह…और पढ़ें
