नई दिल्ली. कहते हैं कि जब सपने जुनून बन जाते हैं, तो उन्हें हकीकत बनने से कोई नहीं रोक सकता. नागेश कुकूनूर की कहानी इसी जुनून और हिम्मत की मिसाल है. एक सफल इंजीनियरिंग करियर को छोड़कर सिनेमा की अनिश्चित दुनिया में कदम रखना आसान नहीं होता, लेकिन नागेश ने यह जोखिम उठाया और अपनी अलग पहचान बनाई.
30 मार्च 1967 को हैदराबाद में जन्मे नागेश कुकूनूर को बचपन से ही फिल्मों का शौक था. वह अक्सर सिनेमाघरों में जाकर तेलुगु और हिंदी फिल्में देखते थे. पढ़ाई में होशियार होने के कारण उन्होंने उस्मानिया विश्वविद्यालय से केमिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और फिर आगे की शिक्षा के लिए जॉर्जिया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी का रुख किया, जहां से उन्होंने एनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग में मास्टर डिग्री हासिल की.
अमेरिका से पूरी की पढ़ाई
अमेरिका में उन्होंने एनवायरनमेंटल कंसल्टेंट के तौर पर एक स्थिर और अच्छी नौकरी शुरू की. जिंदगी सुरक्षित थी, लेकिन दिल कहीं और बसता था. नौकरी में उनका दिल नहीं लगता था क्योंकि उनका दिल सिनेमा में बसता था. यही वजह थी कि नौकरी के साथ-साथ उन्होंने फिल्ममेकिंग से जुड़े वर्कशॉप्स में हिस्सा लेना शुरू किया. अभिनय और निर्देशन सीखते-सीखते उनका शौक धीरे-धीरे जुनून में बदल गया.
फिल्मों की खातिर छोड़ा सबकुछ
आखिरकार, उन्होंने बड़ा फैसला लिया और नौकरी छोड़कर भारत लौट गए. यह कदम जोखिम भरा जरूर था, लेकिन उन्होंने अपने इंजीनियरिंग करियर से कमाए पैसों को अपने सपने में निवेश कर दिया. साल 1998 में उनकी पहली फिल्म ‘हैदराबाद ब्लूज’ रिलीज हुई. कम बजट में बनी इस फिल्म को दर्शकों और आलोचकों से जबरदस्त प्रतिक्रिया मिली. खास बात यह थी कि इस फिल्म की कहानी, निर्देशन और अभिनय तीनों में नागेश खुद शामिल थे. यहीं से उनकी पहचान एक अलग सोच वाले फिल्मकार के रूप में बनने लगी.
‘इकबाल’ ने दिलाई पहचान
इसके बाद उन्होंने ‘तीन दीवारें’ बनाई, जिसने उन्हें आलोचनात्मक सराहना दिलाई और सर्वश्रेष्ठ कहानी का फिल्मफेयर अवॉर्ड भी, लेकिन फिल्ममेकर को असली सफलता ‘इकबाल ‘ से मिली. श्रेयस तलपड़े की फिल्म ‘इकबाल’ ने उन्हें मंझे हुए फिल्ममेकर्स की लिस्ट में शामिल कर दिया. एक मूक-बधिर लड़के के क्रिकेटर बनने के सपने पर आधारित इस फिल्म ने दर्शकों के दिलों को गहराई से छुआ और नागेश कुकूनूर को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी दिलाया.
फिल्ममेकर ने जीते कई नेशनल अवॉर्ड्स
नागेश कुकूनूर की फिल्मों की खासियत यह रही है कि वे सिर्फ मनोरंजन तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि समाज के अहम मुद्दों को सामने लाती हैं. ‘डोर’ में उन्होंने रिश्तों की संवेदनशीलता को दिखाया, ‘आशाएं’ में जीवन और उम्मीद की कहानी कही, जबकि ‘लक्ष्मी’ जैसी फिल्म ने समाज के कड़वे सच, मानव तस्करी को उजागर किया. वहीं ‘धनक’ ने बच्चों के सपनों और मासूमियत को बेहद खूबसूरती से पेश किया.
उनके काम को कई बड़े पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है. ‘इकबाल’ के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से लेकर ‘धनक’ को सर्वश्रेष्ठ बाल फिल्म का सम्मान मिलना, यह साबित करता है कि उनकी फिल्मों में संवेदनशीलता और गहराई दोनों मौजूद हैं. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उनकी फिल्म ‘लक्ष्मी’ को काफी सराहा गया था. फिल्ममेकर की एक और खासियत रही कि उन्होंने अपनी फिल्मों में नए कलाकारों को मौका दिया और वो ए-लिस्टर्स के पीछे नहीं भागते.
