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Mohammed Rafi vs Kishore Kumar : 70 का दशक शुरू होने से पहले ही बॉलीवुड में संगीत की दुनिया तेजी से बदलने लगी. ऐसे में 50 और 60 के दशक में बॉलीवुड में संगीत की दुनिया के बेताज बादशाह मोहम्मद रफी के लिए मुश्किल दौर शुरू हुआ. किशोर कुमार इंडस्ट्री के हर बड़े स्टार की आवाज बनने लगे. 1969 में आई ‘आराधना’ से राजेश खन्ना रातोंरात सुपर स्टार बन गए. जितनी ज्यादा पॉप्युलैरिटी राजेश खन्ना को मिली, किशोर कुमार को उतना ही ज्यादा स्टारडम मिला. बाद में किशोर दा मेगा स्टार अमिताभ बच्चन की आवाज बने लेकिन 50 साल पहले आई एक फिल्म में कुछ ऐसा हुआ कि रफी साहब भी हैरान रह गए. किशोर कुमार का गाने से ज्यादा रफी साहब को प्रमुखता दी गई. आइये जानते हैं दिलचस्प किस्सा…….

बॉलीवुड की यह अनकही सच्चाई है कि प्रोड्यूसर-डायरेक्टर के दबाव में बड़े से बड़े एक्टर बिखर गए. प्रोड्यूसर-डायरेक्टर ने जिसे चाहा, उसे अर्श से फर्श पर बैठा दिया. 70 के दशक में ऐसा ही कुछ लीजेंड सिंगर मोहम्मद रफी के साथ हुआ. इंडस्ट्री में अचानक बदलाव आया. मोहम्मद रफी से ज्यादा किशोर कुमार को ज्यादा गाने मिलने लगे. किशोर कुमार सुपर स्टार राजेश खन्ना, धर्मेंद्र, देवानंद और अमिताभ बच्चन की आवाज बन गए. इसी दौर में धर्मेंद्र की एक फिल्म ‘एक महल हो सपनों का’ बन रही थी जिसमें धर्मेंद्र-शर्मिला टैगोर और लीना चंदावरकर का लव ट्रायंगल था. इस फिल्म के गानों की रिकॉर्डिंग के दौरान कुछ ऐसा हुआ कि मोहम्मद रफी भी हैरान रह गए.

‘एक हो महल हो सपनों का’ फिल्म 9 जुलाई 1975 को रिलीज हुए थी. धर्मेंद्र, शर्मिला टैगोर और लीना चंदावरकर लीड रोल में थे. अशोक कुमार और देवेन वर्मा सपोर्टिंग रोल में थे. म्यूजिक रवि का था और गीत साहिर लुधियानवी ने लिखे थे. कहानी-स्क्रीनप्ले मुश्ताक जलीली ने लिखा था. डायलॉग मुश्ताक जलीली और डॉ. बालकृष्ण ने लिखे थे. फिल्म के डायरेक्टर-प्रोड्यूसर देवेंद्र गोयल थे.

फिल्म में कुल चार गाने थे. धर्मेंद्र चाहते थे कि उन पर फिल्माये जाने वाले गाने मोहम्मद रफी गाएं मगर डायरेक्टर-प्रोड्यूसर देवेंद्र गोयल को किशोर कुमार पसंद थे. नतीजतन तीन गाने किशोर कुमार की आवाज में रिकॉर्ड किए गए. ये गाने थे : देखा है जिंदगी को, इतना करीब से, ‘हमसे पूछो कि हकीकत क्या है’ और तीसरा गीत ‘दिल में किसी के प्यार का’ था.
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दिल्ली के रहने वाले म्यूजिक डायरेक्टर रवि मोहम्मद रफी को अपना अच्छा दोस्त मानते थे. वो चाहते थे कि फिल्म के गाने मोहम्मद रफी गाएं लेकिन प्रोड्यूसर देवेंद्र गोयल के दबाव में कुछ नहीं कर सके और किशोर कुमार से तीन गाने रिकॉर्ड करवा लिए. जब बात टाइटल सॉन्ग की आई तो मामला अटक गया. रवि चाहते थे कि रोमांटिक ड्यूएट मोहम्मद रफी-लता मंगेशकर की आवाज में हो मगर प्रोड्यूसर देवेंद्र गोयल किशोर कुमार के लिए अड़ गए.

प्रोड्यूसर के दबाव में रवि ने यह गाना किशोर कुमार और लता मंगेशकर से रिकॉर्ड करवाने पर राजी हो गए. रिकॉर्डिंग की तैयारियां चल रही थीं. संगीतकार रवि ने अंतिम बार निर्माता-निर्देशक से मोहम्मद रफी के नाम की सिफारिश की लेकिन देवेंद्र गोयल ने कहा कि किशोर कुमार की आवाज अच्छी रहेगी.

कहानी में रोमांचक मोड़ तब आया जब गाना रिकॉर्ड होने के दूसरे दिन डायरेक्टर-प्रोड्यूसर खुद संगीतकार रवि के पास पहुंच गए. उन्होंने कहा कि टाइटल सॉन्ग किशोर दा ने बहुत अच्छे से गाया है, इसमें कोई शक नहीं लेकिन जिस तरह से यह गाना मुझे धर्मेंद्र पर फिल्माना है, उसमें यह गाना मेल नहीं खा रहा है. किशोर कुमार की आवाज धर्मेंद्र की पर्सनैलिटी से मेल नहीं खा रही है. मैं चाहता हूं कि यह गाना मोहम्मद रफी से रिकॉर्ड करवाया जाए.

यह सुनकर संगीतकार रवि खुश हो गए. वो जानते थे कि इस गाने को मोहम्मद रफी ही धर्मेंद्र के अंदाज में गा सकते हैं. संगीतकार रवि ने कहा कि अब यह गाना फिर से रिकॉर्ड नहीं हो सकता. किशोर दा बुरा मान जाएंगे. इस पर देवेंद्र गोयल ने कहा कि आप इस गाने को रफी साहब से रिकॉर्ड करवा लीजिए, बस किसी से इसकी चर्चा ना करें.

हुआ भी कुछ ऐसा ही. संगीतकार रवि का अनुमान सही निकला. ‘एक महल हो सपनों का’ टाइटल सॉन्ग ही फिल्म की पहचान बन गया. यहां तक कि ‘एक महल हो सपनों का’ नाम से टीवी शो भी बना. आम जिंदगी में इस फिल्म के टाइटल का इस्तेमाल खूब किया गया. फिल्म मैसिव हिट रही. 1975 का साल धर्मेंद्र के लिए लकी साल रहा. इसी साल उनकी शोले, प्रतिज्ञा और चुपके-चुपके जैसी फिल्में आई थीं. इन सभी फिल्मों ने धर्मेंद्र का स्टारडम बढ़ाया.
