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सिनेमा और साहित्य का रिश्ता हमेशा से ही बहुत गहरा रहा है. अक्सर जब किसी मशहूर किताब की कहानी को पर्दे पर उतारा जाता है, तो वह एक यादगार फिल्म बन जाती है. विशाल भारद्वाज की अपकमिंग फिल्म ‘ओ रोमियो’ इस कड़ी में नया नाम है, जो हुसैन जैदी की किताब ‘माफिया क्वींस ऑफ मुंबई’ पर आधारित है. लेकिन यह सिलसिला नया नहीं है, साल 1955 में आई सत्यजीत रे की ‘पाथेर पांचाली’ से लेकर ‘पिंजर’ जैसी फिल्मों ने किताबों के पन्नों को बड़े पर्दे पर जीवंत किया है.

नई दिल्ली. सिनेमा के शौकीनों के लिए हमेशा से वो फिल्में खास रही हैं, जिनकी जड़ें साहित्य में होती हैं. अक्सर लोग कहते हैं कि किताब फिल्म से बेहतर थी, लेकिन भारतीय सिनेमा में कुछ ऐसी फिल्में बनीं, जिन्होंने इस बात को कड़ी चुनौती दी. जल्द ही रिलीज होने वाली शाहिद कपूर की ‘ओ रोमियो’ भी इसी लिस्ट का हिस्सा है. वैसे यह ट्रेंड नया नहीं है. साल 1955 की कालजयी ‘पाथेर पांचाली’ से लेकर ‘गरम हवा’ तक संजीदा कहानियां किताबों की देन हैं. यहां पर देखिए 8 फिल्मों की पूरी लिस्ट.

ओ रोमियो: विशाल भारद्वाज इन दिनों अपनी अकमिंग फिल्म ओ रोमियो को लेकर चर्चा में हैं. इसमें शाहिद कपूर हुसैन उस्तरा के किरदार में नजर आएंगे, जो मशहूर राइटर हुसैन जैदी की किताब ‘माफिया क्वींस ऑफ मुंबई’ के हुसैन उस्तारा वाले हिस्से पर आधारित है. यह मूवी 13 फरवरी को सिनेमाघरों में दस्तक देने के लिए पूरी तरह तैयार है.

मकबूल: विशाल भारद्वाज ने शेक्सपियर के नाटक ‘मैकबेथ’ को मुंबई अंडरवर्ल्ड की गलियों में बेहद खूबसूरती से उतारा है. फिल्म में इरफान खान ने मकबूल का किरदार निभाया है, जो महत्वाकांक्षा और अब्बाजी की माशूका (तबू) के चक्कर में पड़कर पागलपन और हिंसा के अंधेरे में खो जाता है. रोंगटे खड़े कर देने वाले संगीत के साथ यह फिल्म भारतीय सिनेमा की सबसे बेहतरीन मनोवैज्ञानिक फिल्मों में गिनी जाती है.
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हैदर: कश्मीर की पृष्ठभूमि पर बनी ‘हैदर’ एक ऐसे स्टूडेंट की कहानी है, जो घर लौटने पर अपने पिता को लापता और मां को चाचा के करीब पाता है. शाहिद कपूर ने हैदर के रूप में अपने करियर की सबसे यादगार परफॉरमेंस दी है. यह फिल्म शेक्सपियर के ‘हैमलेट’ का सिर्फ रूपांतरण भर नहीं है, बल्कि यह कश्मीर के राजनीतिक हालात, बदले की आग और व्यवस्था की हिंसा को बेहद संजीदगी से पर्दे पर पेश करती है.

पिंजर: अमृता प्रीतम के उपन्यास पर आधारित ‘पिंजर’ बंटवारे के दौर की एक दास्तां है. फिल्म पूरो (उर्मिला मातोंडकर) की कहानी कहती है, जिसे पुश्तैनी दुश्मनी के चलते राशिद (मनोज बाजपेयी) अगवा कर लेता है. यह फिल्म विस्थापन के दर्द और महिलाओं के साथ हुए अन्याय को बहुत गहराई से दिखाती है.फिल्म बहुत ही सादगी के साथ इंसानी जज्बात और रिश्तों की जटिलता को बयां करती है.

गरम हवा: बंटवारे के बाद के आगरा पर आधारित एमएस सथ्यू की यह फिल्म समानांतर सिनेमा की एक मिसाल है. यह सलीम मिर्जा (बलराज साहनी) की कहानी है, जिनका परिवार शक, पलायन और आर्थिक तंगी के बीच बिखरने लगता है। अपनी सादगी और यथार्थवाद के जरिए यह फिल्म केवल एक व्यक्ति के नैतिक संघर्ष को ही नहीं, बल्कि विभाजन के उन गहरे जख्मों को भी दिखाती है, जिनसे पूरा देश आज भी जूझ रहा है.

चेम्मीन: केरल के मछुआरा समुदाय की पृष्ठभूमि पर बनी यह एक त्रासद प्रेम कहानी है. फिल्म हिंदू मछुआरे की बेटी करुथम्मा और मुस्लिम व्यापारी परीकुट्टी के बीच उस दौर के वर्जित रोमांस को दिखाती है. स्थानीय लोककथाओं और मिथकों में लिपटी यह राष्ट्रीय पुरस्कार (बेस्ट फीचर फिल्म) जीतने वाली दक्षिण भारत की पहली फिल्म बनी थी.

ओरु वड़क्कन वीरगाथा: इस फिल्म में ममूटी ने केरल की लोककथाओं के मशहूर योद्धा चंदू चेकावर का किरदार निभाया है. बरसों से चली आ रही कहानियों में चंदू को हमेशा एक धोखेबाज के रूप में देखा जाता था, लेकिन इस फिल्म ने उन्हें एक ऐसे नायक के रूप में पेश किया, जिसे अपनों और किस्मत ने बार-बार धोखा दिया. एमटी वासुदेवन नायर की बेहतरीन पटकथा वाली यह फिल्म इतिहास और कल्पना का शानदार मेल है. यह फिल्म आज भी मलयाली सिनेमा की सबसे यादगार महागाथाओं में गिनी जाती है.

पाथेर पांचाली: सत्यजीत रे की यह पहली फिल्म विश्व सिनेमा का एक अहम हिस्सा है. ग्रामीण बंगाल में रहने वाले अपु के बचपन के जरिए यह फिल्म रोजमर्रा की छोटी खुशियों और गहरे दुखों को बड़े ही काव्यमयी ढंग से दिखाती है. अपनी बेमिसाल सादगी और हकीकत के करीब होने की वजह से इसने भारतीय सिनेमा को वैश्विक पहचान दिलाई. कान्स फिल्म फेस्टिवल में सम्मानित यह फिल्म आज भी मानवीय संवेदनाओं का सबसे बड़ा दस्तावेज मानी जाती है. यह मूवी बिभूतिभूषण बंद्योपाध्याय के उपन्यास पर आधारित है.
