April 22, 2026
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बीआर चोपड़ा की कालजयी फिल्म ‘नया दौर’ की सफलता के पीछे उनके अटूट विश्वास की एक अनोखी कहानी है. इंसान और मशीन के संघर्ष पर आधारित इस फिल्म की कहानी को शुरुआत में दिग्गज निर्देशक महबूब खान सहित कई फिल्मकारों ने ‘बकवास’ और ‘जोखिम भरी’ बताकर खारिज कर दिया था. महबूब खान ने तो चोपड़ा साहब को चेतावनी तक दी थी कि यह फिल्म उन्हें ‘बर्बाद’ कर देगी. हालांकि, बीआर चोपड़ा अपने फैसले पर अडिग रहे. फिल्म रिलीज हुई और ब्लॉकबस्टर साबित हुई. इसकी सफलता देख महबूब खान ने न केवल अपनी गलती मानी, बल्कि फिल्म की सिल्वर जुबली पर गेस्ट बनकर चोपड़ा साहब के साहस की खुले मंच से सराहना भी की.

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नई दिल्ली: हिंदी सिनेमा के इतिहास में बीआर चोपड़ा एक ऐसा नाम हैं, जिनके बिना फिल्म इंडस्ट्री की कहानी अधूरी है. उन्होंने अपनी फिल्मों के जरिए हमेशा समाज को कुछ नया देने की कोशिश की. लेकिन उनकी सबसे बड़ी मास्टरपीस फिल्मों में से एक ‘नया दौर’ (1957) को लेकर एक ऐसा दिलचस्प किस्सा है जिसे सुनकर आज भी हैरानी होती है. इस फिल्म को बनाने से पहले चोपड़ा साहब को कई बड़े दिग्गजों के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा था.

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बीआर चोपड़ा सिर्फ मनोरंजन के लिए फिल्में नहीं बनाते थे, बल्कि उनके लिए सिनेमा एक स्कूल की तरह था. कल यानी 22 अप्रैल को इस महान फिल्मकार की जयंती है, जिन्हें 1998 में दादा साहब फाल्के पुरस्कार से भी नवाजा गया था. उनकी सोच हमेशा समय से आगे रही, यही वजह थी कि उन्होंने एक ऐसी कहानी पर दांव खेला जिसे उस दौर के बड़े-बड़े फिल्ममेकर्स ने बेकार समझकर कूड़ेदान में डाल दिया था.

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किस्सा कुछ यूं है कि फिल्म ‘नया दौर’ की कहानी लेखक एफए मिर्जा ने लिखी थी. यह कहानी इंसान और मशीन के बीच की जंग को दिखाती थी, जिसमें एक तांगा चलाने वाला अपनी रोजी-रोटी बचाने के लिए संघर्ष करता है. जब यह कहानी इंडस्ट्री के बड़े निर्देशकों को सुनाई गई, तो किसी ने इसे ‘बकवास’ कहा तो किसी ने इसे महज एक ‘डॉक्यूमेंट्री’ बताकर खारिज कर दिया. किसी को यकीन नहीं था कि तांगे वाले की फिल्म भी हिट हो सकती है.

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महबूब खान, जो उस दौर के बहुत बड़े निर्देशक थे, उन्हें भी यह कहानी कतई पसंद नहीं आई. उन्हें लगा कि एक तांगे वाले और बस की रेस जैसी कहानी पर फिल्म बनाना पैसे की बर्बादी है. महबूब खान तो यहां तक फिक्रमंद थे कि वे खुद बीआर चोपड़ा के घर पहुंच गए और उन्हें चेतावनी दी कि ‘भाई, इस फिल्म को मत बनाओ, वरना तुम पूरी तरह बर्बाद हो जाओगे और इंडस्ट्री से तुम्हारा नाम मिट जाएगा.’

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बीआर चोपड़ा को अपनी कहानी और अपनी सोच पर पूरा भरोसा था. उन्होंने महबूब खान की सलाह को प्यार से सुना लेकिन अपने इरादे नहीं बदले. उन्होंने तय किया कि वे इस फिल्म को स्टूडियो के बंद कमरों के बजाय असली गांवों और खेतों में शूट करेंगे, ताकि दर्शक उस मिट्टी की खुशबू को महसूस कर सकें. उनके इसी अटूट विश्वास ने उन्हें फिल्म पर काम शुरू करने की हिम्मत दी.

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जब फिल्म ‘नया दौर’ रिलीज हुई, तो इसने वो कर दिखाया जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी. फिल्म न सिर्फ बॉक्स ऑफिस पर सुपरहिट रही, बल्कि दिलीप कुमार और वैजयंतीमाला की जोड़ी ने दर्शकों का दिल जीत लिया. बस और तांगे की उस रेस ने सिनेमाघरों में सीटियाँ बजवा दीं. देखते ही देखते फिल्म ने सफलता के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए और भारतीय सिनेमा की एक कालजयी फिल्म बन गई.

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मंच पर खड़े होकर महबूब खान ने सबके सामने माना कि वे इस कहानी को समझने में चूक कर गए थे. उन्होंने खुले दिल से तारीफ करते हुए कहा कि बीआर चोपड़ा की हिम्मत और अपने काम के प्रति उनके जुनून की आज जीत हुई है. यह किस्सा हमें सिखाता है कि अगर आपको अपने काम और विजन पर भरोसा हो, तो दुनिया की कोई भी रुकावट आपको सफल होने से नहीं रोक सकती.

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