Last Updated:
बिहार के एक छोटे से गांव से निकले एक्टर का बॉलीवुड स्टार बनने का सफर बेहद प्रेरणादायक है. एनएसडी से तीन बार रिजेक्शन और शुरुआती स्ट्रगल के बाद फिल्म ‘बैंडिट क्वीन’ में उनके काम ने निर्देशक राम गोपाल वर्मा का ध्यान खींचा. रामू उन्हें तीन साल से तलाश रहे थे और इसी मुलाकात ने उन्हें फिल्म ‘सत्या’ में ‘भीखू म्हात्रे’ का यादगार रोल दिलाया. आज मनोज बाजपेयी को उनकी संजीदा एक्टिंग के लिए तीन नेशनल अवॉर्ड और पद्म श्री मिल चुका है. ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ से लेकर ओटीटी की ‘द फैमिली मैन’ तक, उन्होंने हर जॉनर में अपनी काबिलियत का लोहा मनवाया.

नई दिल्ली: हिंदी सिनेमा में अपनी अदाकारी का लोहा मनवाने वाले एक्टर आज किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं. लेकिन उनकी सफलता के पीछे स्ट्रगल की एक ऐसी कहानी है, जो किसी फिल्म से कम नहीं लगती. एक दौर ऐसा था जब वह काम की तलाश में भटक रहे थे, मगर फिर एक ऐसी मुलाकात हुई जिसने न सिर्फ उनका करियर बल्कि बॉलीवुड में एक्टिंग की परिभाषा ही बदल दी. (फोटो साभार: IMDb)

मनोज बाजपेयी का जन्म 23 अप्रैल 1969 को बिहार के एक छोटे से गांव बेलवा में हुआ था. एक साधारण किसान परिवार से ताल्लुक रखने के बावजूद उनकी आंखों में बड़े पर्दे पर छाने के सपने पल रहे थे. गांव की गलियों से निकलकर दिल्ली तक का सफर उन्होंने सिर्फ इसलिए तय किया ताकि वह अभिनय की बारीकियों को सीख सकें और अपनी मंजिल पा सकें. (फोटो साभार: IMDb)

मनोज ने दिल्ली आकर नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (NSD) में दाखिले की कोशिश की, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था. उन्हें एक बार नहीं, बल्कि तीन बार रिजेक्ट किया गया. यह उनके जीवन का सबसे कठिन समय था, जहां टूटने की गुंजाइश ज्यादा थी. इसके बावजूद, उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और दिल्ली के रंगमंच यानी थिएटर में खुद को पूरी तरह झोंक दिया. (फोटो साभार: IMDb)
Add News18 as
Preferred Source on Google

थिएटर में नाम कमाने के बाद जब एक्टर मुंबई पहुंचे, तो वहां की चमक-धमक में खुद को साबित करना और भी मुश्किल था. उन्हें शुरुआती दौर में बहुत छोटे रोल मिले. इसी बीच, उन्हें शेखर कपूर की फिल्म ‘बैंडिट क्वीन’ में काम करने का मौका मिला. हालांकि इस फिल्म में उनका किरदार छोटा था और उनके लुक के कारण उन्हें पहचानना मुश्किल था, लेकिन यही फिल्म उनके भविष्य की चाबी बनी. (फोटो साभार: IMDb)

फिल्म ‘दौड़’ की कास्टिंग के दौरान मनोज बाजपेयी की मुलाकात मशहूर निर्देशक राम गोपाल वर्मा से हुई. रामू को जैसे ही पता चला कि मनोज वही कलाकार हैं जिन्होंने ‘बैंडिट क्वीन’ में मान सिंह का रोल किया था, वे अपनी कुर्सी से खड़े हो गए. उन्होंने हैरानी से कहा कि वे पिछले तीन सालों से उस कलाकार को ढूंढ रहे थे जिसकी एक्टिंग ने उन्हें प्रभावित किया था. (फोटो साभार: IMDb)

राम गोपाल वर्मा मनोज के टैलेंट के कायल हो गए थे. हालांकि ‘दौड़’ में मनोज को एक छोटा सा रोल मिला, लेकिन राम गोपाल वर्मा ने उनसे वादा किया था कि वह उनके लिए कुछ बड़ा प्लान करेंगे. अपना वादा निभाते हुए रामू ने फिल्म ‘सत्या’ बनाई, जिसमें मनोज ने ‘भीखू म्हात्रे’ का किरदार निभाया. फिल्म रिलीज होते ही मनोज बाजपेयी रातों-रात सुपरस्टार बन गए. (फोटो साभार: IMDb)

‘सत्या’ की कामयाबी के बाद मनोज बाजपेयी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा. ‘शूल’, ‘पिंजर’, ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ और ‘अलीगढ़’ जैसी फिल्मों के जरिए उन्होंने साबित किया कि एक कलाकार अपनी मेहनत के दम पर इंडस्ट्री में अपनी जगह बना सकता है. उन्हें तीन राष्ट्रीय पुरस्कारों और पद्म श्री से सम्मानित किया जा चुका है, जो उनके बेहतरीन सफर की गवाही देते हैं.(फोटो साभार: IMDb)

मनोज का आज के डिजिटल दौर में भी जादू बरकरार है. ‘द फैमिली मैन’ जैसी वेब सीरीज के जरिए उन्होंने ओटीटी प्लेटफॉर्म पर भी अपनी बादशाहत कायम की है. बिहार के एक छोटे से गांव से निकलकर ‘मुंबई का किंग’ बनने तक का उनका यह सफर आज के हर उभरते हुए कलाकार के लिए एक बड़ी प्रेरणा है.(फोटो साभार: IMDb)
