July 30, 2026
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नई दिल्ली: भारतीय सिनेमा में बेहतरीन फिल्मकार हुए हैं. उन्होंने मनोरंजन के साथ-साथ दर्शकों को सोचने पर मजबूर किया. श्याम बेनेगल का नाम इस लिस्ट में सबसे पहले आता है. श्याम बेनेगल ऐसे निर्देशक थे जिनकी फिल्मों में न शोर था न दिखावा, लेकिन हर कहानी के पीछे गहरी सोच थी. उनके साथ काम करने वाले कलाकार उन्हें सिर्फ निर्देशक नहीं, बल्कि ज्ञान का खजाना मानते थे. अमरीश पुरी उन्हें ‘चलता-फिरता विश्वकोश’ कहते थे. वह इतिहास, राजनीति, साहित्य और सिनेमा समेत हर विषय पर घंटों बात कर सकते थे.

श्याम सुंदर बेनेगल का जन्म 14 दिसंबर 1934 को हैदराबाद में हुआ था. उनके पिता फोटोग्राफर थे, इसलिए घर में कैमरा और तस्वीरों का माहौल बचपन से ही था. उन्होंने इसी कारण महज 12 साल की उम्र में अपने पिता के कैमरे से पहली फिल्म बनाई. पढ़ाई में उन्होंने अर्थशास्त्र में एमए किया, लेकिन उनका मन हमेशा सिनेमा की तरफ ही रहा. कॉलेज के दिनों में उन्होंने फिल्म सोसाइटी बनाई, जहां फिल्मों पर चर्चा होती थी. यहीं से उनके भीतर का ‘सोचने वाला फिल्मकार’ धीरे-धीरे आकार लेने लगा.

विज्ञापन एजेंसी में सीखे फिल्ममेकिंग के गुर
श्याम बेनेगल पढ़ाई पूरी करने के बाद मुंबई आए और एक विज्ञापन एजेंसी में कॉपीराइटर के तौर पर काम करने लगे. विज्ञापन की दुनिया ने उन्हें कैमरे, फ्रेम और कहानी को छोटे समय में कहने की कला सिखाई. इसी दौरान उन्होंने सैकड़ों विज्ञापन और डॉक्यूमेंट्री फिल्में बनाईं. यही अनुभव आगे चलकर उनकी फिल्मों की सबसे बड़ी ताकत बना. उन्होंने साल 1962 में गुजराती भाषा में अपनी पहली डॉक्यूमेंट्री बनाई. वे इसके बाद एफटीआईआई पुणे में पढ़ाने लगे और आने वाली पीढ़ी के फिल्मकारों को भी सिनेमा की समझ दी.

पहली फिल्म से दर्शकों को किया हैरान
साल 1973 में आई श्याम बेनेगल की पहली फीचर फिल्म ‘अंकुर’ ने भारतीय सिनेमा को चौंका दिया. यह फिल्म गांव, किसान और शोषण जैसे मुद्दों पर आधारित थी. बिना किसी बड़े सितारे के बनी यह फिल्म राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने में सफल रही और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंची. ‘निशांत’, ‘मंथन’ और ‘भूमिका’ जैसी फिल्मों ने उन्हें पैरलल सिनेमा का सबसे बड़ा नाम बना दिया. ‘मंथन’ फिल्म उन्होंने हजारों किसानों के साथ मिलकर बनाई थी.

हिंदी सिनेमा को दिए नगीने
श्याम बेनेगल की खास बात थी कि वे सिर्फ फिल्म नहीं बनाते थे, बल्कि विषय को पूरी तरह समझते थे. वे किसी कहानी पर काम शुरू करने से पहले उसके इतिहास, सामाजिक बैकग्राउंड और राजनीतिक असर को गहराई से पढ़ते थे. इसी वजह से अमरीश पुरी जैसे कलाकार कहते थे कि श्याम बेनेगल से बात करना किसी किताब पढ़ने जैसा है. वे उन्हें ‘चलता-फिरता विश्वकोश’ कहते थे. सेट पर वे इतिहास, समाज और इंसान के व्यवहार पर ऐसे उदाहरण देते थे कि कलाकार भी हैरान रह जाते थे. उन्होंने भारतीय सिनेमा को नसीरुद्दीन शाह, शबाना आजमी, स्मिता पाटिल, ओम पुरी और अमरीश पुरी जैसे कलाकार दिए, जिनकी अदाकारी आज भी मिसाल मानी जाती है. फिल्मों के साथ-साथ उन्होंने दूरदर्शन के लिए ‘भारत एक खोज’ जैसा ऐतिहासिक धारावाहिक भी बनाया, जिसने करोड़ों लोगों को भारत के इतिहास से जोड़ा.

राजनीति के जरिये की देश की सेवा
श्याम बेनेगल को अपने लंबे करियर में 18 से ज्यादा नेशनल फिल्म अवॉर्ड मिले थे. उन्हें 1976 में पद्मश्री, 1991 में पद्मभूषण और 2005 में दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया. उन्होंने राज्यसभा सांसद के रूप में भी देश की सेवा की. उनकी आखिरी फिल्म ‘मुजीब: द मेकिंग ऑफ ए नेशन’ साल 2023 में रिलीज हुई. 23 दिसंबर 2024 को 90 साल की उम्र में श्याम बेनेगल का निधन हो गया. उनके जाने से भारतीय सिनेमा ने सिर्फ एक निर्देशक नहीं, बल्कि एक ऐसा ‘चलता-फिरता विश्वकोश’ खोया, जो सिनेमा को सोच, समझ और संवेदना से जोड़ता था.



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