February 24, 2026
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नई दिल्ली: बॉलीवुड में एक्टर बनने के शौक के चलते मुंबई आए, लेकिन नियति ने उन्हें बड़ा फिल्ममेकर बना दिया. हम सुभाष घई की बात कर रहे हैं, जिनका जन्म 24 जनवरी 1945 को नागपुर में हुआ था. सुभाष घई एक ऐसा नाम हैं, जिन्हें राज कपूर के बाद बॉलीवुड का दूसरा ‘शोमैन’ कहा जाता है. उनकी फिल्मों में केवल कहानी नहीं होती, बल्कि एक उत्सव होता है, जिसमें संगीत, ड्रामा और बेहतरीन अभिनय का संगम मिलता है. देश के विभाजन के बाद उनका परिवार दिल्ली आ गया. रोहतक से कॉमर्स में स्नातक करने के बाद, उन्होंने अपनी कलात्मक प्रतिभा को निखारने के लिए पुणे के प्रतिष्ठित फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (FTII) में दाखिला लिया.

दिलचस्प बात यह है कि सुभाष घई ने अपने करियर की शुरुआत एक अभिनेता के रूप में की थी. उन्होंने ‘आराधना’ और ‘उमंग’ जैसी फिल्मों में छोटे-बड़े रोल किए, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था. अभिनय में खास सफलता न मिलने के बाद उन्होंने निर्देशन की ओर रुख किया, जिसने हिंदी सिनेमा का इतिहास बदल दिया.

निर्देशन का सुनहरा दौर
सुभाष ने 1976 में फिल्म ‘कालीचरण’ के साथ बतौर निर्देशक अपनी पारी शुरू की. इसके बाद उन्होंने ‘कर्ज’, ‘विधाता’, ‘हीरो’, ‘कर्मा’, ‘राम-लखन’, ‘खलनायक’, ‘सौदागर’ और ‘ताल’ जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्मों की झड़ी लगा दी. उनकी फिल्मों का संगीत आज भी लोगों की जुबां पर रहता है.

‘एम’ अक्षर का अनोखा संयोग
सुभाष घई के करियर का सबसे रोचक पहलू उनका ‘एम’ (M) अक्षर के प्रति लगाव रहा. उन्होंने बॉलीवुड को मीनाक्षी शेषाद्री, माधुरी दीक्षित, मनीषा कोइराला, महिमा चौधरी कई बड़ी अभिनेत्रियां दीं और संयोगवश उन सभी का नाम ‘M’ से शुरू होता था. यह उनका एक ‘लकी चार्म’ बन गया. इन अभिनेत्रियों को लॉन्च करने के साथ ही उन्होंने जैकी श्रॉफ जैसे सितारों को भी फर्श से अर्श तक पहुंचाया.

सिनेमा में तकनीकी क्रांति और योगदान
सुभाष घई केवल एक निर्देशक ही नहीं, बल्कि एक दूरदर्शी निर्माता भी रहे. उन्होंने फिल्म ‘ताल’ के जरिए भारत में ‘फिल्म इंश्योरेंस’ की परंपरा शुरू की. सिनेमा के प्रति उनके प्रेम का सबसे बड़ा प्रमाण उनका फिल्म स्कूल ‘व्हिसलिंग वुड्स इंटरनेशनल’ है, जो आज दुनिया के बेहतरीन संस्थानों में गिना जाता है. 2006 में उन्हें फिल्म ‘इकबाल’ के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया.



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