नई दिल्ली. पिछले कुछ सालों में बॉलीवुड में असल जिंदगी के हीरो पर बनी फिल्मों का एक नया और जोशीला दौर शुरू हुआ है, जहां आदित्य धर और रणवीर सिंह की ‘धुरंधर’ ने बॉक्स ऑफिस पर इतिहास रच दिया, वहीं इतिहास के पन्नों से एक ऐसा हीरो पर्दे पर लौटा, जिसकी रगों में बदला और देशभक्ति एक साथ बसी थी. शूजित सरकार और विक्की कौशल की ‘सरदार उधम’ (2021) में हीरो के शांत और संयमित किरदार के बाद, वसीम अमरोही अब ‘द लेजेंड ऑफ उधम सिंह’ के साथ लौटे हैं. यह फिल्म न सिर्फ एक शहीद की गाथा है, बल्कि जलियांवाला बाग में 21 साल तक जलती रही उस आग का जीता-जागता दस्तावेज भी है, जो सात समंदर पार जाकर बदला चुकाने के लिए जली थी. इस फिल्म को ओटीटी प्लेटफॉर्म वेव्स पर रिलीज किया गया है.
कहानी
फिल्म की कहानी हमें 13 अप्रैल 1919 के उस काले दिन पर ले जाती है, जिसे कोई भी भारतीय नहीं भूल सकता- अमृतसर का जलियांवाला बाग, जहां जनरल डायर के आदेश पर निहत्थे बेगुनाहों का कत्लेआम किया गया था. इस कत्लेआम के पीछे असली मास्टरमाइंड पंजाब का उस समय का लेफ्टिनेंट गवर्नर माइकल ओ’डायर था. फिल्म यहीं से शुरू होती है और दिखाती है कि कैसे एक युवा सरदार उधम सिंह इस क्रूरता का गवाह बनता है. कहानी 1919 से 1940 के बीच के 21 सालों की है, इस दौरान उधम सिंह दुनिया भर में घूमते हैं, अपना नाम बदलते हैं, लेकिन उनका मकसद नहीं बदलता. जब 13 मार्च 1940 को लंदन के कैक्सटन हॉल में उधम सिंह की पिस्तौल से निकली गोलियां ओ’डायर के सीने में लगती हैं, तो यह सिर्फ एक हत्या नहीं बल्कि लाखों भारतीयों के आत्म-सम्मान की जीत होती है. शिफूजी शौर्य भारद्वाज की राइटिंग ने इतिहास के इन पन्नों को बहुत डिटेल और सीरियसली बुना है.
एक्टिंग
अक्सर बड़े किरदारों की तुलना होना लाजमी है. विक्की कौशल ने ‘सरदार उधम’ में इंट्रोवर्ट और शांत उधम सिंह का रोल किया था, लेकिन वसीम अमरोही ने इस कैरेक्टर में आग भर दी है. अमरोही के उधम सिंह के चेहरे पर बेचैनी और आंखों में बदला साफ दिखता है जो एक आदमी को 21 साल तक जगाए रखता है. अपनी बॉडी लैंग्वेज से लेकर डायलॉग डिलीवरी तक, वसीम ने साबित कर दिया है कि उन्होंने इस रोल के लिए खुद को पूरी तरह से डेडिकेट कर लिया है. कई सीन में उनकी स्क्रीन प्रेजेंस इतनी जबरदस्त है कि वह विक्की कौशल की परफॉर्मेंस को टक्कर देती है. शिफूजी शौर्य भारद्वाज की प्रेजेंस फिल्म में जोश का एक अनोखा एलिमेंट जोड़ती है. फिल्म की दूसरी सपोर्टिंग कास्ट ने भी अंग्रेजों की क्रूरता और भारतीय क्रांतिकारियों की लाचारी को शानदार ढंग से दिखाया है.
डायरेक्शन
वसीम अमरोही ने डायरेक्शन का जिम्मा संभालकर एक बड़ा फैसला लिया. फिल्म को स्लो-बर्न ड्रामा बनाने के बजाय, उन्होंने इसे एक असरदार थ्रिलर के तौर पर पेश किया है. क्रिएटिव डायरेक्टर दिनेश सुदर्शन सोई का असर हर फ्रेम में साफ दिखता है. जिस असलियत के साथ उन्होंने 1920 और 1930 के दशक के लंदन और भारत को फिर से बनाया है, वह तारीफ के काबिल है. फिल्म के विजुअल्स न सिर्फ एक कहानी बताते हैं बल्कि हमें उस दौर के डर और जुनून का भी एहसास कराते हैं. डायरेक्शन की सबसे खास बात यह है कि फिल्म कभी उपदेश देने वाली नहीं लगती, बल्कि यह दर्शकों को संघर्ष का हिस्सा होने का एहसास कराती है.
सिनेमैटोग्राफी
फिल्म की सिनेमैटोग्राफी शानदार है. जिस तरह से जलियांवाला बाग हत्याकांड के सीन शूट किए गए हैं, वह आपको अंदर तक हिला देंगे. खून से सनी जमीन, कुओं में कूदते लोग और खामोशी को चीरती गोलियों की आवाज… इन सीन को जिस तरह से कैमरे में कैद किया गया है, वह शानदार है. लंदन के सीन में ग्रे और डार्क टोन का इस्तेमाल उधम सिंह के मानसिक संघर्ष और अकेलेपन को पूरी तरह से दिखाता है.
म्यूजिक
शूजित सरकार की फिल्म अपनी ‘साइलेंस’ के लिए जानी जाती थी, वहीं अमरोही की फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर, जो जायद इसहाक ने तैयार किया है वह इसकी रीढ़ है. म्यूजिक में एक भारी अंडरटोन है जो देशभक्ति के जोश को बढ़ाता है. एक्शन सीक्वेंस के दौरान बैकग्राउंड स्कोर रोंगटे खड़े कर देने वाला है और इमोशनल सीन में यह दर्शकों की आंखों में आंसू लाने की ताकत रखता है.
कमियां
कोई भी फिल्म परफेक्ट नहीं होती. ‘द लेजेंड ऑफ उधम सिंह’ के लिए सबसे बड़ी चुनौती इसकी लंबाई है. 1919 से 1940 तक के सफर को दिखाने की कोशिश में फिल्म बीच में थोड़ी धीमी हो जाती है. इसके अलावा, कुछ सीन में सिनेमाई छूट ली गई है, जो इतिहास के शौकीनों को थोड़ी अजीब लग सकती है. कुछ ब्रिटिश किरदारों को थोड़ा ज्यादा जोर से दिखाया गया है, कभी-कभी वे भी अजीब लगते हैं.
अंतिम फैसला
‘द लेजेंड ऑफ उधम सिंह’ में वसीम अमरोही ने सरदार उधम सिंह को एक फ्रेश और एनर्जेटिक नजरिए से पेश किया है. अगर आप विक्की कौशल की फिल्म के फैन हैं, तो भी आपको यह फिल्म देखनी चाहिए क्योंकि यह उसी कहानी का एक अलग, ज्यादा एग्रेसिव और इमोशनल साइड दिखाती है. हिंदी सिनेमा को ऐसी कहानियों की सख्त जरूरत है ताकि आने वाली पीढ़ियां अपना इतिहास न भूलें. घर बैठे आप इस फिल्म को ओटीटी पर अपने पूरे परिवार के साथ देख सकते हैं. मेरी ओर से इस फिल्म को 5 में से 3.5 स्टार.
