March 31, 2026
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इन महान जैनमुनि को PM ने व्हीलचेयर पर दिया सहारा, कितने बड़े हैं ये सुरेश्वर

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महावीर जयंती के मौके पर पीएम मोदी ने आचार्य श्री पदम सागर सूरीश्वरजी महाराज साहेब की व्हीलचेयर को खींच रहे थे, इसकी फोटोज और वीडियो सोशल मीडिया पर काफी तेजी से वायरल हो रही है. जैन मुनि श्री पदम सागर सूरीश्वरजी महाराज साहेब दिगंबर नहीं, बल्कि श्वेतांबर जैन परंपरा के एक प्रतिष्ठित आचार्य (सूरीश्वर) हैं, जिन्हें जैन धर्म में विद्वता, तपस्या और प्रवचन के लिए जाना जाता है. आइए जानते हैं सूरीश्वरजी महाराज साहेब के बारे में खास बातें…

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज महावीर जयंती के अवसर पर गुजरात के गांधीनगर में सम्राट संप्रति संग्रहालय का उद्घाटन किया. इस कार्यक्रम के दौरान पीएम मोदी की व्हीलचेयर पर बैठे जैन मुनि श्री पदम सागर सूरीश्वरजी महाराज साहेब की मदद की, जिसकी तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर काफी वायरल हो रहे हैं. बता दें कि श्री पदम सागर सूरीश्वरजी महाराज साहेब श्वेतांबर जैन समाज में एक विद्वान संत और आध्यात्मिक गुरु के रूप में जाना जाता है. श्री पदम सागर सूरीश्वरजी महाराज साहेब ने अपना जीवन पूरी तरह से धर्म, साधना और आत्मकल्याण के मार्ग को समर्पित किया है. आइए जानते हैं सूरीश्वरजी महाराज साहेब के बारे में खास बातें…

जैन धर्म की समृद्ध परंपरा में अनेक आचार्य और मुनि हुए हैं, जिन्होंने अपने ज्ञान, तप और त्याग के माध्यम से समाज को नई दिशा दी है. इन्हीं में एक प्रमुख नाम है जैन मुनि श्री पदम सागर सूरीश्वरजी महाराज साहेब, जिन्हें श्वेतांबर जैन समाज में एक विद्वान संत और आध्यात्मिक गुरु के रूप में जाना जाता है. सूरीश्वर की उपाधि जैन परंपरा में अत्यंत सम्मानजनक मानी जाती है, जो केवल उन आचार्यों को दी जाती है, जिन्होंने शास्त्रों का गहन अध्ययन किया हो और जो संघ का मार्गदर्शन करने में सक्षम हों. श्री पदम सागर सूरीश्वरजी महाराज साहेब देश के विभिन्न हिस्सों में भ्रमण कर धर्म प्रचार करते हैं. जैन चातुर्मास के दौरान उनके प्रवचन सुनने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु एकत्रित होते हैं. उनके उपदेशों का मुख्य उद्देश्य लोगों को नैतिक जीवन, शुद्ध आचरण और आत्मचिंतन की ओर प्रेरित करना है.

पदम सागर सूरीश्वरजी महाराज साहेब का जन्म 10 सिंतबर 1935 को अजीमगंज (बंगाल) की पावन भूमि पर हुआ था. उनके पिता का नाम श्री रामस्वरूप सिंह और माता का नाम भवानीदेवी था. पूज्यश्री का संसारी नाम प्रेमचंद था. जन्म से उनमें नम्रता, विवेक, विनय, सरलता, निजानंद की मस्ती, भावनाशीलता, मधुभाषीपणुं, गुणज्ञदृष्टि आदि सद्गुण वारसे में मिले थे. उनका प्राथमिक शिक्षण अजीमगंज में हुआ था. उसके बाद धार्मिक और व्यावहारिक उच्च शिक्षण काशी वाले आचार्यश्री विजयधर्मसूरिजी महाराज साहेब की प्रेरणा से मध्यप्रदेश के शिवपुरी शहर में स्थपित श्री वीरतत्त्व प्रकाशन मंडल में रहकर प्राप्त किया.

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महाराज साहेब जैन आगमों और प्राचीन धर्मग्रंथों के गहरे ज्ञाता माने जाते हैं. उनके प्रवचनों में धर्म की गहराई के साथ-साथ सरल भाषा का प्रयोग होता है, जिससे आम व्यक्ति भी जैन सिद्धांतों को सहजता से समझ सके. वे अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह और संयम जैसे मूल सिद्धांतों को जीवन में उतारने पर जोर देते हैं. आज के दौर में, जहां भौतिकवाद तेजी से बढ़ रहा है, वहां महाराज साहेब युवा पीढ़ी को आध्यात्मिकता और संस्कारों की ओर लौटने का संदेश देते हैं. वे बताते हैं कि सच्ची खुशी बाहरी संसाधनों में नहीं, बल्कि आत्मिक शांति और संतुलन में है.



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