May 29, 2026
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60 और 70 के दशक में गीतकार योगेश ने ‘कहीं दूर जब दिन ढल जाए’ और ‘रिमझिम गिरे सावन’ जैसे कालजयी गीतों के जरिए सादगी और भावनाओं का अनूठा संगम पेश किया. ऋषिकेश मुखर्जी जैसे बड़े निर्देशकों के पसंदीदा रहे योगेश ने कठिन शब्दों के बजाय आम आदमी की भाषा को तरजीह दी. दादासाहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित योगेश भले ही 2020 में दुनिया छोड़ गए, लेकिन उनके सदाबहार नगमे आज भी लोगों के दिलों में जिंदा हैं.

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हिंदी सिनेमा का वो गीतकार, जिनके गीतों के बिना फिल्में लगती थीं अधूरीZoom

गीतकार योगेश के गानों से 60-70 का दशक गुलजार रहा.

नई दिल्ली: मुंबई की चकाचौंध में अपनी जगह बनाना आसान नहीं होता, लेकिन लखनऊ का एक 16 साल का लड़का जब 1943 में घर से निकला, तो उसे शायद खुद भी अंदाजा नहीं था कि वह हिंदी सिनेमा के सुनहरे दौर की नींव रखने जा रहा है. योगेश गौड़, जिन्हें दुनिया सिर्फ ‘योगेश’ के नाम से जानती है, काम की तलाश में मुंबई आए और फिर कलम से वो जादू किया कि लोग आज भी उनके गीतों में सुकून ढूंढते हैं. 60 और 70 के दशक में जब बड़े-बड़े शायर भारी-भरकम शब्दों का इस्तेमाल कर रहे थे, तब योगेश जी ने ‘कहीं दूर जब दिन ढल जाए’ और ‘जिंदगी कैसी है पहेली’ जैसे नगमों के जरिए आम आदमी के जज्बातों को बेहद सरल जुबान में पिरोया. उनके ये गीत आज भी उतने ही ताजा लगते हैं, जैसे कल ही लिखे गए हों.

गीतकार योगेश की सबसे बड़ी ताकत उनकी सादगी थी, जो सीधे दिल पर दस्तक देती थी. उन्होंने ऋषिकेश मुखर्जी और बासु चटर्जी जैसे दिग्गज निर्देशकों के साथ मिलकर ‘रजनीगंधा फूल तुम्हारे’, ‘रिमझिम गिरे सावन’ और ‘बड़ी सूनी सूनी है’ जैसे अमर गीत दिए. उनकी रचनाओं में जीवन की अनिश्चितता, उदासी और प्यार का एक ऐसा मेल था जो सुनने वाले को भावुक कर देता था. सिर्फ फिल्में ही नहीं, बल्कि टीवी सीरियल्स और बाद के दौर में ‘बेवफा सनम’ जैसी एल्बम्स के जरिए भी उन्होंने अपनी लेखनी का लोहा मनवाया. संगीतकार निखिल-विनय की जोड़ी के साथ उनके काम को भी काफी पसंद किया गया. एक दौर तो ऐसा था कि उनके लिखे गीतों के बिना फिल्म अधूरी मानी जाती थी.

जिंदगी की पहेली सुलझाने का हौसला देते गाने
गीतकारी में योगेश जी के इसी अभूतपूर्व योगदान के लिए उन्हें दादासाहब फाल्के और यश भारती जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कारों से नवाजा गया. भले ही 29 मई 2020 को बीमारी के कारण वह हमारे बीच से चले गए, लेकिन उनकी विरासत आज भी उनके गीतों में जिंदा है. ‘आए तुम याद मुझे’ जैसे गीतों को सुनते वक्त आज भी ऐसा लगता है जैसे योगेश जी अपनी कलम के जरिए हमसे बात कर रहे हों. उन्होंने साबित किया कि अगर भावनाओं में गहराई हो, तो शब्दों को बहुत मुश्किल होने की जरूरत नहीं होती. हिंदी सिनेमा का वो युग उनके साथ ही खत्म हो गया, पर उनके गीत सदियों तक हमें जिंदगी की पहेली सुलझाने का हौसला देते रहेंगे.

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Abhishek NagarSenior Sub Editor

अभिषेक नागर ‘न्यूज18 डिजिटल’ में सीनियर सब एडिटर के पद पर काम कर रहे हैं. दिल्ली के रहने वाले अभिषेक नागर ‘न्यूज18 डिजिटल’ की एंटरटेनमेंट टीम का हिस्सा हैं. उन्होंने एंटरटेनमेंट बीट के अलावा करियर, हेल्थ और पॉल…और पढ़ें





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