April 9, 2026
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नई दिल्ली. डायरेक्टर अनुभव सिन्हा और एक्ट्रेस तापसी पन्नू जब भी स्क्रीन पर साथ आते हैं, तो वे सिर्फ एंटरटेनमेंट ही नहीं, बल्कि समाज को आईना भी दिखाते हैं. ‘मुल्क’ और ‘थप्पड़’ जैसी क्लासिक फिल्मों के बाद, यह जोड़ी अब 20 फरवरी 2026 को ‘अस्सी’ के साथ थिएटर में आने के लिए तैयार है. यह फिल्म एक ऐसी कड़वी सच्चाई पर आधारित है जो किसी भी सेंसिटिव इंसान की रूह को हिला देने के लिए काफी है. फिल्म का टाइटल ‘अस्सी’ भारत में रोजाना होने वाले एवरेज 80 रेप के डरावने आंकड़ों को दिखाता है. अपने खास बेबाक अंदाज में अनुभव सिन्हा ने जस्टिस सिस्टम की नाकामी और पीड़ितों के संघर्ष को दिखाया है.

अपनी शानदार एक्टिंग के लिए जानी जाने वाली तापसी पन्नू इस फिल्म में एक वकील के रोल में नजर आएंगी जो सिस्टम की मुश्किलों और समाज के दोहरे मापदंडों से जूझती है. यह फिल्म सिर्फ एक क्राइम स्टोरी नहीं है, बल्कि दर्शकों से यह सवाल भी पूछती है कि एक समाज के तौर पर हम कहां खड़े हैं. ‘अस्सी’ ऐसी घटनाओं के बाद अक्सर छाई चुप्पी को तोड़ने की कोशिश करती है. 20 फरवरी को रिलीज होने वाली इस फिल्म का बॉक्स ऑफिस पर क्या असर होने वाला है तो बताना थोड़ा मुश्किल है, लेकिन उम्मीद है कि यह दर्शकों की सोच को जरूर झकझोर देगी.

कहानी
फिल्म का टाइटल ‘अस्सी’ सिर्फ एक नंबर नहीं है, बल्कि भारतीय समाज पर एक कलंक है, जो उस बेरहमी की कड़वी सच्चाई को दिखाता है जिसका सामना औसतन 80 औरतें हर दिन करती हैं. डायरेक्टर ने फिल्म की शुरुआत एक दिल दहला देने वाले सीन से की है जो देखने वाले को अंदर तक हिला देता है- एक औरत रेलवे ट्रैक पर चोटिल और अधमरी पड़ी है, समाज के भेड़ियों ने उसकी इज्जत को तार-तार कर दिया है. यह परिमा (कनी कुसुरुथी) की कहानी है, जो एक आम स्कूल टीचर है. वह अपने पति विनय (मोहम्मद जीशान अय्यूब) और छोटे से परिवार के साथ खुशहाल जिंदगी जी रही थी. लेकिन एक बुरी रात पांच जवान लड़के उसे एक मेट्रो स्टेशन के बाहर से किडनैप कर लेते हैं और चलती कार में गैंग रेप की करते हैं, और यह फिल्म का सबसे परेशान करने वाला हिस्सा है.

कोर्ट की कार्रवाई शुरू होती है, जहां वकील रवि (तापसी पन्नू) परिमा को इंसाफ दिलाने की कोशिश करती हैं, लेकिन इंसाफ में रुकावट है दीपराज (मनोज पाहवा), जिसके पास अपने क्रिमिनल बेटे को बचाने के लिए सिस्टम और सबूतों को मैनिपुलेट करने की पावर है. विनय का दोस्त कार्तिक (कुमुद मिश्रा), जो अपनी पत्नी को खोने से बहुत ज्यादा सदमे में है, जब वह देखता है कि विक्टिम को कानून के हाथों इंसाफ मिलने के बजाय बेइज्जत किया जा रहा है, तो उसका सब्र जवाब दे जाता है. फिल्म का दूसरा हिस्सा एक विजिलेंट थ्रिलर बन जाता है. इसके आगे क्या होता है, ये जानने के लिए आपको 20 फरवरी को सिनेमाघर जाकर पूरी फिल्म दखनी होगी.

डायरेक्शन
अनुभव सिन्हा ने ‘मुल्क’, ‘आर्टिकल 15’ और ‘थप्पड़’ जैसी फिल्मों से समाज की गड़बड़ियों को दिखाने का एक अनोखा स्टाइल बनाया है. ‘अस्सी’ में उनका डायरेक्शन भी बहुत रॉ और ईमानदार है. उन्होंने फिल्म को सिर्फ एक विजिलेंट थ्रिलर तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे एक इमोशनल ड्रामा के तौर पर बनाया है. फिल्म का पहला हाफ पूरी तरह से रियलिस्टिक है, लेकिन दूसरे हाफ में उन्होंने कमर्शियल सिनेमा के एलिमेंट्स का बड़ी चतुराई से इस्तेमाल किया है. अनुभव सिन्हा की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वह स्क्रीन पर हिंसा को ग्लैमराइज नहीं करते, बल्कि उसे इतना परेशान करने वाला बना देते हैं कि दर्शक दर्द महसूस कर सकें.

सिनेमैटोग्राफी
फिल्म की विजुअल लैंग्वेज बहुत कुछ कहती है. सिनेमैटोग्राफर ने दिल्ली और उसके आस-पास के इलाकों को बहुत ग्रे और कोल्ड टोन में दिखाया है, जो फिल्म के सीरियस सब्जेक्ट मैटर के हिसाब से सही है. जिस सीन में परिमा को रेलवे ट्रैक पर दिखाया गया है, वह लाइटिंग और कैमरा एंगल से एक अजीब सी खामोशी पैदा करता है. मेट्रो स्टेशन के बाहर के रात के शॉट्स को बहुत अच्छे से इस्तेमाल किया गया है. कैमरा न सिर्फ किरदारों को फॉलो करता है, बल्कि एक दुखी परिवार को अपने बंद कमरों में जो घुटन महसूस होती है, उसे भी कैप्चर करता है.

बैकग्राउंड स्कोर
‘अस्सी’ का बैकग्राउंड स्कोर फिल्म की जान है. इसमें कम शोर और ज्यादा शांति का इस्तेमाल किया गया है. टेंशन वाले सीन में बेस और धीमी स्ट्रिंग्स का इस्तेमाल दिल की धड़कन बढ़ा देता है. खासकर जब कुमुद मिश्रा का किरदार कानून अपने हाथ में लेता है, तो म्यूजिक में भारीपन और ‘बदले’ की भावना होती है. बैकग्राउंड स्कोर कभी भी डायलॉग पर हावी नहीं होता, बल्कि सीन की इमोशनल गहराई को बढ़ाता है.

कमियां
इतनी अच्छी तरह से बनी फिल्म होने के बावजूद ‘अस्सी’ कुछ मामलों में कम पड़ जाती है.

  • फिल्म का पहला आधा हिस्सा किरदारों को जमाने में बहुत समय लेता है, जिससे कुछ दर्शकों को रफ्तार धीमी लग सकती है.
  • एक विजिलेंट ड्रामा होने के कारण, फिल्म का अंत थोड़ा अंदाजा लगाया जा सकने वाला लगता है. दर्शक पहले से ही भांप सकते हैं कि आगे क्या होने वाला है.
  • तापसी पन्नू और कुमुद मिश्रा के किरदारों को काफी जगह दी गई है, लेकिन मनोज पाहवा और जीशान अय्यूब जैसे अनुभवी कलाकारों के किरदारों को और ज्यादा परतें दी जा सकती थीं.
  • कुछ सीन इतने परेशान करने वाले हैं कि वे संवेदनशील दर्शकों के लिए सिनेमा में बने रहना मुश्किल बना सकते हैं.

अंतिम फैसला
अपनी सभी खूबियों और कुछ छोटी-मोटी कमियों के साथ, ‘अस्सी’ एक ऐसी फिल्म है जिसे नजरअंदाज करना नामुमकिन है. यह जितनी टेक्निकली मजबूत है, उतनी ही सोच के मामले में भी तेज है. मेरी ओर से इस फिल्म को 5 में से 3 स्टार.



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