February 23, 2026
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मैंने दिवंगत अभिनेता धर्मेंद्र जी और असरानी जी को पहली बार फिल्म ‘शोले’ में एक साथ देखा था, और यह कितना बड़ा इत्तेफाक है कि मुझे उन दोनों को आखिरी बार फिल्म ‘इक्कीस’ में एक साथ देखने का मौका मिला. यह फिल्म इन दोनों महान एक्टर्स को श्रद्धांजलि है और फिल्म के लीड एक्टर अगस्त्य नंदा बहुत खुशकिस्मत हैं कि उन्हें धर्मेंद्र और असरानी जी के साथ बड़े पर्दे पर डेब्यू करने का मौका मिला. ‘इक्कीस’ की कहानी परमवीर चक्र विजेता सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल के बारे में है, जो 21 साल की उम्र में देश के लिए शहीद हो गए थे.

श्रीराम राघवन की इक्कीस एक ऐसी वॉर फिल्म है जो गोलियों, धमाकों और जोशीले संवादों के बजाय इंसानों की भावनाओं पर टिकती है. यह फिल्म 1971 के भारत-पाक युद्ध में शहीद हुए सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल के जीवन से प्रेरित है, लेकिन इसे सिर्फ वीरता की कहानी बनाकर नहीं पेश किया गया. इक्कीस उन जख्मों को दिखाती है जो हर युद्ध के पश्चात, उसमे शामिल या शहीद हुए सैनिकों और उनके परिवारों के दिलों पर गहरा निशान छोड़ जाते है.

फिल्म की कहानी दो अलग-अलग समय में चलती है. एक हिस्सा 1971 का है, जहां युवा टैंक कमांडर अरुण खेत्रपाल युद्ध के मैदान में अपने कर्तव्य का सामना करते हैं. दूसरा हिस्सा 2001 में सेट है, जहां अरुण के पिता और एक पाकिस्तानी पूर्व सैनिक की मुलाकात होती है. यह दूसरा ट्रैक फिल्म को सिर्फ वॉर ड्रामा नहीं रहने देता, बल्कि उसे एक भावनात्मक और इंसानी नजरिया देता है.

पटकथा की खास बात यह है कि यह किसी भी मोड़ पर जबरदस्ती देशभक्ति का नारा नहीं लगाती. कहानी धीरे-धीरे आगे बढ़ती है और दर्शक को सोचने का मौका देती है. युद्ध यहां जीत-हार से ज्यादा जिम्मेदारी, डर और फैसलों की कहानी बनकर सामने आता है. श्रीराम राघवन का निर्देशन इस फिल्म की सबसे बड़ी ताकतों में से एक है. वह हर सीन को जरूरत से ज्यादा नहीं खींचते और न ही दर्शकों को भावुक करने के लिए आसान रास्ता अपनाते हैं. युद्ध के दृश्य हों या दो बुजुर्ग सैनिकों की बातचीत-हर जगह संतुलन साफ नजर आता है.

राघवन का फोकस शोर पर नहीं, असर पर है. कई बार खामोशी ज्यादा बोलती है और यही चीज फिल्म को खास बनाती है जिस से यह साफ दिखता है कि निर्देशक को अपनी ऑडियंस पर पूरा भरोसा है. अगस्त्य नंदा अरुण खेत्रपाल के रोल में ईमानदार और सच्चे लगते हैं. वह अपने किरदार को ओवर-एक्ट नहीं करते. एक युवा अफसर का जोश, डर और जिम्मेदारी-सब कुछ उनके चेहरे पर साफ झलकता है. उनका अभिनय दिखावे से दूर रहता है, जो इस किरदार के लिए जरूरी था.

धर्मेंद्र का प्रदर्शन बेहद भावुक करने वाला है. कम संवादों में वह पिता का दर्द, गर्व और खालीपन बखूबी दिखाते हैं. उनकी मौजूदगी फिल्म को गहराई देती है. यह जानना कि यह उनकी आखिरी वॉर फिल्म है, उनके हर सीन को और भी असरदार बना देता है. जयदीप अहलावत एक बार फिर साबित करते हैं कि वह इस दौर के सबसे भरोसेमंद कलाकारों में से एक हैं. उनका किरदार शांत है, लेकिन मजबूत है. धर्मेंद्र के साथ उनके सीन फिल्म के सबसे यादगार पलों में गिने जाएंगे. दोनों कलाकार बिना ऊंची आवाज के बहुत गहरी बात कह जाते हैं.

सिमर भाटिया का रोल छोटा है, लेकिन जरूरी है. वह कहानी में एक भावनात्मक संतुलन लाती हैं और उस जिंदगी की झलक दिखाती हैं, जो अरुण जी सकते थे. फिल्म का म्यूजिक बहुत सधा हुआ है. यहां कोई ऐसा गाना नहीं जो कहानी से ध्यान हटाए. बैकग्राउंड स्कोर सीन के हिसाब से चलता है- जहां जरूरत हो, वहां हल्का तनाव पैदा करता है और भावुक पलों में चुपचाप साथ देता है. यही सादगी फिल्म को मजबूत बनाती है.

इक्कीस में वीएफएक्स का इस्तेमाल सीमित लेकिन असरदार है. टैंक युद्ध के सीन असली लगते हैं और किसी वीडियो गेम जैसे नहीं दिखते. साउंड डिजाइन, कैमरा वर्क और एडिटिंग मिलकर युद्ध के माहौल को विश्वसनीय बनाते हैं, बिना जरूरत से ज्यादा चमक-दमक के.

इक्कीस एक ऐसी वॉर फिल्म है जो जंग को शोर नहीं बनाती. यह फिल्म यादों, रिश्तों और उन जख्मों की बात करती है जो समय के साथ भी पूरी तरह नहीं भरते. शानदार अभिनय, सधा हुआ निर्देशन और ईमानदार कहानी इसे खास बनाती है. अगर आप ऐसी फिल्म देखना चाहते हैं जो युद्ध को इंसान की नजर से देखे, तो इक्कीस जरूर देखी जानी चाहिए. मेरी ओर से फिल्म को 5 में से 3.5 स्टार.



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