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सुपर-स्टारडम का बढ़ना जितना दिलचस्प है, उसका खत्म होना भी उतना ही बेरहम है. 1960 के दशक में शम्मी कपूर की एनर्जी और ‘जुबली कुमार’ का जादू सबसे ऊपर था, लेकिन इंडस्ट्री में राजेश खन्ना के उदय के साथ सब कुछ बदल गया. एक बार दिग्गज अभिनेता आशीष विद्यार्थी ने शम्मी कपूर से अपनी मुलाकात का एक दिल को छू लेने वाला किस्सा सुनाया था. उन्होंने बताया था कि कैसे राजेश खन्ना के चमकते ही लोगों ने शम्मी कपूर का मजाक उड़ाना शुरू कर दिया था.

नई दिल्ली. 1969 बॉलीवुड में बड़े बदलाव का साल था, जिसने यह साबित किया था कि कैमरा किसी एक चेहरे पर नहीं, बल्कि एक ‘लहर’ पर फोकस करेगा. यह लहर राजेश खन्ना की थी, लेकिन जब ‘काका’ का जादू सबसे ऊपर था, तो कुछ लेजेंडरी एक्टर ऐसे भी थे जिन्होंने दशकों तक बॉक्स ऑफिस पर राज किया था. उनमें से एक सबसे बड़ा नाम शम्मी कपूर का था. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, एक बार दिग्गज अभिनेता आशीष विद्यार्थी ने उस दौर का एक कड़वा सच सबके सामने रखा था, जो न सिर्फ बॉलीवुड की चकाचौंध के पीछे के अंधेरे को दिखाता है, बल्कि यह भी बताता है कि यहां लोग सिर्फ उगते सूरज को ही सलाम करते हैं. (तस्वीर बनाने में एआई की मदद ली गई है.)

आशीष विद्यार्थी ने उस समय को याद किया था, जब वे अपने करियर के शुरुआती दौर में थे. वे शारजाह में पॉपुलर टीवी सीरियल ‘दास्तान’ की शूटिंग कर रहे थे. उस वक्त शम्मी कपूर भी वहां मौजूद थे. वे एक प्रोड्यूसर के साथ अपनी फिल्म ‘चट्टान’ की शूटिंग करने आए थे. आशीष ने बताया था कि शम्मी जी के साथ बिताया गया समय उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा सबक बन गया. एक दिन बातचीत के दौरान शम्मी कपूर ने आशीष से कहा था, ‘बेटा, एक बात हमेशा याद रखना… इस इंडस्ट्री में लोग तुम्हारी हवा निकाल देंगे.’ यह सिर्फ एक चेतावनी नहीं थी, बल्कि किसी ऐसे व्यक्ति का अनुभव था जिसने शोहरत की ऊंचाइयां भी देखी थीं और उस चोटी से गिरने का दर्द भी.

शम्मी कपूर ने आशीष विद्यार्थी को एक किस्सा सुनाया था. उन्होंने बताया कि जैसे-जैसे उनका स्टारडम कम होने लगा, वही लोग जो कभी उनके ऑटोग्राफ के लिए तरसते थे, अब उनका मजाक उड़ाने लगे. शम्मी ने कहा था, ‘जब मेरी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर अच्छा परफॉर्म नहीं कर रही थीं, तो लोग मेरे पास आकर मुझे ताना मारते थे, ‘क्या हुआ शम्मी जी? आजकल आपके पीछे आने वाली भीड़ कहां गायब हो गई है?’
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यह सवाल किसी भी आर्टिस्ट के लिए दिल तोड़ने वाला होता है. लेकिन शम्मी कपूर का जवाब उनकी महानता को दिखाता है. उन्होंने शांति से कहा, ‘बेटा, वह भीड़ गायब नहीं हुई है; उसका पता बस बदल गया है. वह भीड़ अब ‘आशीर्वाद’ (राजेश खन्ना का बंगला) के बाहर खड़ी है.’ 1960 के दशक में शम्मी कपूर अपनी एनर्जी, डांसिंग और स्टाइल के लिए जाने जाते थे. ‘जंगली’, ‘तीसरी मंजिल’ और ‘एन इवनिंग इन पेरिस’ जैसी फिल्मों ने उन्हें सुपरस्टार बना दिया, लेकिन 1969 में ‘आराधना’ से राजेश खन्ना की धमाकेदार शुरुआत ने सिनेमा का पूरा ग्रामर बदल दिया.

राजेश खन्ना की लगातार 15 सोलो हिट फिल्में, जिसने शम्मी कपूर जैसे एनर्जेटिक एक्टर की काबिलियत का भी रिकॉर्ड बनाया था, अब फीकी पड़ने लगीं. ‘बागी’ हीरो के बजाय, दर्शक अब ‘रोमांटिक और सेंसिटिव’ हीरो चाहते थे. हजारों फैन रोज राजेश खन्ना के बंगले ‘आशीर्वाद’ के बाहर लाइन में लगते थे और लड़कियां उनकी कार की धूल से अपने बालों को भरती थीं. यह वह दौर था जब शम्मी कपूर को एहसास हुआ कि समय बदल गया है.

आशीष विद्यार्थी ने कहा था कि शम्मी कपूर की ये बातें हमेशा उनके दिल में बस गईं. शम्मी का मैसेज साफ था- ‘आज अपनी किस्मत से मिली सफलता का जश्न मनाओ. लेकिन यह कभी मत भूलना कि यह पल हमेशा के लिए नहीं है. जो लोग आज तुम्हारी तारीफ कर रहे हैं, कल जब तुम्हारा समय खत्म होगा, तो वही सबसे पहले तुमसे दूर भागेंगे.’

बॉलीवुड एक ऐसी जगह है जहां सफलता के हजारों रिश्तेदार होते हैं, लेकिन नाकामी हमेशा अनाथ होती है. शम्मी कपूर ने आशीष से कहा कि वह खुद को इस बात के लिए मेंटली तैयार करे कि एक दिन वह अकेला रह जाएगा और उसे अभी उस अकेलेपन को सहने की ताकत रखनी होगी.
