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1970 का दशक बॉलीवुड में अक्सर अमिताभ बच्चन और विनोद खन्ना के बीच पावर स्ट्रगल के लिए याद किया जाता है, लेकिन असली बॉक्स ऑफिस के आंकड़ों में गहराई से जाने पर एक ज्यादा कड़ा मुकाबला सामने आता है. यह वह दौर था जब राजेंद्र कुमार, जिनका जमा-जमाया साम्राज्य और भारत के पहले सुपरस्टार राजेश खन्ना का जबरदस्त क्रेज, टकरा रहे थे. इन दो दिग्गजों के बीच इस बॉक्स ऑफिस लड़ाई ने न सिर्फ फिल्म डिस्ट्रीब्यूशन के समीकरण बिगाड़ दिए, बल्कि डिस्ट्रीब्यूटर और प्रोड्यूसर के पसीने भी छुड़ा दिए.

नई दिल्ली. 1970 का दशक बॉलीवुड का गोल्डन एज था, जिसे आज भी मसाला फिल्मों और ‘एंग्री यंग मैन’ के उदय के लिए जाना जाता है. अक्सर जब हम उस दौर के मुकाबले की बात करते हैं, तो सबसे पहले अमिताभ बच्चन और विनोद खन्ना का नाम दिमाग में आता है, लेकिन बॉक्स ऑफिस के आंकड़ों का करीब से एनालिसिस करने पर एक और जोड़ी सामने आती है जिनका मुकाबला और भी ज्यादा कड़ा और अस्त-व्यस्त था. यह मुकाबला राजेंद्र कुमार और राजेश खन्ना के बीच था. इन दोनों सुपरस्टार्स की फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर ऐसा धमाल मचाया कि फिल्म क्रिटिक्स और डिस्ट्रीब्यूटर्स भी हिसाब-किताब नहीं कर पाए. (तस्वीर बनाने में एआई की मदद ली गई है.)

माडिया रिपोर्ट्स बताती है कि 70 के दशक में राजेंद्र कुमार अपने करियर के उस मोड़ पर थे, जहां उनकी लगभग फिल्में सिल्वर जुबली (25 हफ्ते) मनाती थीं. उनकी सादगी और फैमिली वाली फिल्मों ने उन्हें घर-घर में मशहूर कर दिया था. दूसरी ओर, 1969 की फिल्म ‘आराधना’ से राजेश खन्ना ने फिल्म इंडस्ट्री में ऐसा धमाका किया जो पहले कभी नहीं देखा गया था. राजेश खन्ना की पॉपुलैरिटी किसी चमत्कार से कम नहीं थी. उनका सिर हिलाने वाला स्टाइल और उनकी जादुई मुस्कान राजेंद्र कुमार के जमे-जमाए साम्राज्य को चुनौती देने लगी थी.

इन दोनों स्टार्स के बीच मुकाबला कड़ा था, खासकर इसलिए क्योंकि उनकी फिल्में एक ही समय में बॉक्स ऑफिस पर टकराती थीं. 1970 के दशक की शुरुआत में, राजेंद्र कुमार की ‘आन मिलो सजना’ और राजेश खन्ना की ‘कटी पतंग’ या ‘सच्चा झूठा’ जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए अक्सर थिएटर्स के बाहर लंबी लाइनें लग जाती थीं. यह स्थिति डिस्ट्रीब्यूटर्स के लिए काफी मुश्किल हो गई थी, क्योंकि उस समय स्क्रीन शेयरिंग को लेकर कोई साफ नियम नहीं थे.
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राजेंद्र कुमार की फिल्मों के पास एक खास ऑडियंस थी, जो उनकी इमोशनल कहानियों को पसंद करती थी, जबकि राजेश खन्ना की फिल्मों ने युवाओं, खासकर महिलाओं के बीच बहुत ज्यादा क्रेज पैदा किया. बॉक्स ऑफिस पर इतनी उथल-पुथल मच गई कि इन दोनों स्टार्स की फिल्में अक्सर एक ही शहर के दो बड़े थिएटर्स में एक-दूसरे से मुकाबला करती थीं.

राजेंद्र कुमार हमेशा अपने शांत और नरम एक्टिंग स्टाइल के लिए जाने जाते थे. उनकी फिल्मों में अक्सर त्याग, प्यार और पारिवारिक मूल्यों के थीम होते थे. इस बीच, राजेश खन्ना ने स्क्रीन पर ‘रोमांटिक हीरो’ की इमेज को एक नए लेवल पर पहुंचा दिया. उनका करिश्मा इतना जबरदस्त था कि लोग अक्सर उनकी कारों की धूल से अपने माथे भर लेते थे.

इसके तुरंत बाद अमिताभ बच्चन और विनोद खन्ना का दौर मजबूती से स्थापित हो गया, लेकिन 1970 के दशक की शुरुआत के उस बदलाव के दौर में राजेंद्र कुमार और राजेश खन्ना के बीच ‘जंग’ बॉलीवुड के इतिहास में दर्ज है. जहां राजेंद्र कुमार अपनी ‘जुबली’ रेप्युटेशन बनाए रखने की कोशिश कर रहे थे, वहीं राजेश खन्ना एक ‘सुपरस्टार’ के तौर पर अपनी पहचान और मजबूत कर रहे थे.

यह दौर फिल्ममेकर्स के लिए सबसे ज्यादा फायदेमंद और स्ट्रेसफुल दोनों था. शक्ति सामंत और ऋषिकेश मुखर्जी जैसे डायरेक्टर्स जानते थे कि इन दोनों एक्टर्स में से किसी एक को अपनी फिल्मों में कास्ट करने से सफलता पक्की हो जाएगी. हालांकि, जब उनकी फिल्में एक ही हफ्ते में रिलीज होती थीं तो रिस्क होता था. इससे बॉक्स ऑफिस कलेक्शन बंट जाते थे, जिससे प्रोड्यूसर्स के लिए उन ‘ऐतिहासिक’ आंकड़ों तक पहुंचना मुश्किल हो जाता था जिनकी उन्हें उम्मीद थी.

राजेश खन्ना का जादू राजेंद्र कुमार की ‘जुबली’ जर्नी पर हावी होने लगा, लेकिन दोनों के बीच जबरदस्त मुकाबले ने इंडियन फिल्म डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम और बॉक्स ऑफिस मैनेजमेंट को पूरी तरह से बदल दिया. यह एक ऐसा दौर था जिसने साबित कर दिया कि भारतीय दर्शक सिर्फ स्टार के नहीं, बल्कि बेहतरीन सिनेमा के भूखे थे. (तस्वीर बनाने में एआई की मदद ली गई है.)
