May 27, 2026
2-2026-05-db6e15ddb090c47e9dda7f358052524e-1200x675.jpg
Spread the love


Last Updated:

Handmade stone art village traditional craft story : झारखंड के जंगलों और पहाड़ियों के बीच बसा छोटा सा ढाई कुसुम गांव आज भी सदियों पुरानी पत्थर तराशने की कला को जिंदा रखे हुए है. यहां के कारीगर बिना किसी मशीन के केवल हाथों और पारंपरिक औजारों की मदद से पत्थरों को खूबसूरत बर्तनों, सजावटी सामान और शिवलिंग जैसी आकर्षक कलाकृतियों में बदल देते हैं. पीढ़ियों से चली आ रही इस अनोखी कला के जरिए गांव के कई परिवार अपनी रोजी-रोटी चला रहे हैं, लेकिन इतनी मेहनत के बावजूद उन्हें अब तक वह पहचान और बाजार नहीं मिल पाया है, जिसके वे असली हकदार हैं.

लाइफ

हमने इतिहास और किताबों में पढ़ा है कि हजारों साल पहले इंसान पत्थरों को काटकर औजार और रोजमर्रा की चीजें बनाया करता था. समय बदला, मशीनें आईं और वह पुरानी कला धीरे-धीरे खत्म होती चली गई. लेकिन झारखंड में आज भी एक ऐसा गांव मौजूद है, जहां लोग सदियों पुरानी इस कला को अपने हाथों से जिंदा रखे हुए हैं. जमशेदपुर से करीब 75 किलोमीटर दूर, बंगाल बॉर्डर के पास बेलपहाड़ी प्रखंड के अंतर्गत आने वाला छोटा सा गांव “ढाई कुसुम” आज भी पत्थरों को तराशकर खूबसूरत सामग्री बनाने के लिए जाना जाता है. इस गांव में करीब 10 से 15 परिवार ऐसे हैं, जिनकी पूरी जिंदगी और रोजी-रोटी इसी काम पर निर्भर है.

लाइफ

यहां के लोग पहाड़ों से पत्थर निकालते हैं और फिर बिना किसी मशीन के केवल हाथ और पारंपरिक औजारों की मदद से उन्हें शानदार आकार देते हैं. इनकी बनाई हुई चीजों को देखकर कोई भी आसानी से धोखा खा सकता है कि यह मशीन से बनी हैं, जबकि हकीकत में हर डिजाइन हाथों की महीन मेहनत का नतीजा होता है.

लाइफ

गांव में बनने वाली सामग्री सिर्फ सामान्य पत्थर के बर्तन तक सीमित नहीं है. यहां कप, गिलास, प्लेट, कटोरा और बाउल से लेकर शिवलिंग, दिया और घर सजाने की कई आकर्षक वस्तुएं तैयार की जाती हैं. हर सामान में इतनी बेहतरीन फिनिशिंग होती है कि देखने वाले बस देखते ही रह जाते हैं. खास बात यह है कि पत्थर की बनी ये चीजें काफी मजबूत और लंबे समय तक चलने वाली होती हैं.

Add News18 as
Preferred Source on Google

लाइफ

गांव के ग्रामीण मोतीलाल बताते हैं कि यह कला उनके पूर्वजों से चली आ रही है. पहले उनके दादा और पिता यही काम करते थे, और अब नई पीढ़ी भी इस परंपरा को आगे बढ़ा रही है. उनके अनुसार, “यह सिर्फ काम नहीं बल्कि हमारी पहचान है. बचपन से यही देखकर बड़े हुए हैं और अब हमारे बच्चे भी यही सीख रहे हैं.” हालांकि इतनी मेहनत और खूबसूरत कला के बावजूद इन कलाकारों को वह सम्मान और बाजार नहीं मिल पा रहा, जिसके वे हकदार हैं. गांव में जो सामान 200 से 300 रुपये में बिक जाता है, वही ऑनलाइन बाजार में 1200 से 1500 रुपये तक में बेचा जाता है. लेकिन सही बाजार और पहचान नहीं मिलने की वजह से इनकी आमदनी बेहद कम है.

लाइफ

आज के आधुनिक दौर में जहां मशीनों का दबदबा बढ़ता जा रहा है, वहीं ढाई कुसुम गांव के ये कलाकार अपने हाथों की कला से इतिहास को जिंदा रखे हुए हैं. जरूरत है कि सरकार और समाज इन कारीगरों की मदद करे, ताकि यह अनोखी कला आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रह सके. क्योंकि यह सिर्फ पत्थर नहीं, बल्कि झारखंड की संस्कृति, मेहनत और विरासत की कहानी है.



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Enable Notifications OK No thanks