April 14, 2026
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कहां से शुरू करूं और कहां खत्म करूं… यह थोड़ा मुश्किल है, क्योंकि फिल्म खुद कुछ ‘गुस्ताख इश्क’ जैसी है. सालों बाद मैंने कोई ऐसी फिल्म देखी है जो शायराना अंदाज में लिखी गई हो. यह पुरानी दिल्ली की गलियों और पुराने जमाने के रोमांस पर आधारित है. एक ऐसी लव स्टोरी जो आज कल देखने को नहीं मिलती, क्योंकि वह जमाना बीत चुका है. सबसे पहले मैं यह कहना चाहूंगा कि मनीष मल्होत्रा ​​ने ‘गुस्ताख इश्क’ बनाकर बहुत बड़ा रिस्क लिया, क्योंकि आज के जमाने में ऐसी फिल्म बनाने के लिए बहुत हिम्मत चाहिए. वह एक कमाल के डिजाइनर हैं और कॉस्ट्यूम की तरह उन्होंने अपनी इस फिल्म को भी शानदार तरीके से डिजाइन किया है. ‘गुस्ताख इश्क’ 90 के दशक की कहानी है, जहां आप पुरानी दिल्ली और पंजाब में खो जाएंगे.

फिल्म में विजय वर्मा ‘नवाबुद्दीन सैफुद्दीन रहमान’, फातिमा सना शेख ‘मिन्नी’, नसीरुद्दीन शाह ‘अजीज/बब्बा’ और शारिब हाशमी ‘अटैची’ के रोल में हैं. कहानी बताने से पहले मैं यह बताना चाहूंगा कि यह फिल्म काफी धीमी है और इसके लिए सब्र की जरूरत है. अगर आप सब्र रखेंगे, तो आप फिल्म को समझ जाएंगे, और तभी आप इसका मजा ले पाएंगे. यहां न आपको कोई कॉमेडी, एक्शन और न ही कोई सस्पेंस मिलेगा, मिलेगा तो सिर्फ वो ‘इश्क’ जिसमें गुस्ताखियां भरी हुई है. अगर आप सच्चे आशिक हैं फिर तो ये फिल्म आपके लिए ही बनाई गई है, क्योंकि ऐसी फिल्में आज कल बनती नहीं हैं.

फिल्म में अजीज एक मशहूर शायर है. लोग उसकी शायरी के दीवाने हैं. फिर एक दिन अजीज गायब हो जाता है, और उसके बारे में कोई नहीं जानता. उसका एक दोस्त है जो उसे मशहूर करना चाहता था. वह अजीज का इतना दीवाना था कि उसकी शायरी अपने प्रेस में छपवाना चाहता था. लेकिन, अजीज के अचानक गायब होने से वह टूट जाता है और एक दिन वह इस दुनिया को अलविदा कह देता है. इधर अजीज के इसी दोस्त का बेटा नवाबुद्दीन सैफुद्दीन रहमान अब बड़ा हो चुका है और अपने पिता की आखिरी इच्छा पूरी करना चाहता है. वह चाहता है कि अजाज की शायरी उसके पिता के प्रिंटिंग प्रेस में छपे. जब उसका प्रिंटिंग प्रेस बिकने वाला होता है, तो वह दिल्ली से पंजाब जाता है, इस उम्मीद में कि शायद वह अजीज को उनकी शायरी छापने के लिए मना ले और उनकी शायरी से वह अपना प्रिंटिंग प्रेस बचा ले.

अजीज अब काफी बूढ़ा हो गया है और लोग उसे ‘बब्बा’ कहते हैं. नवाबुद्दीन एक अजनबी के भेष में अजीज से मिलता है और उससे शायरी सीखना शुरू करता है. इस बीच, वह अजीज की बेटी मिन्नी से मिलता है, हालांकि मिन्नी को पहले से ही सब कुछ पता है और उसने ही नवाबुद्दीन को बुलाया था. नवाबुद्दीन धीरे-धीरे अजीज के परिवार के साथ घुलने-मिलने लगता है और मिन्नी से प्यार करने लगता है, लेकिन यह प्यार आसान नहीं होता… क्या नवाबुद्दीन और मिन्नी कभी साथ हो पाएंगे? अजीज अचानक दिल्ली से क्यों गायब हो जाता है? क्या होगा जब अजीज को पता चलेगा कि नवाबुद्दीन उसके दोस्त का बेटा है? इन सभी सवालों के जवाब जानने के लिए आपको थिएटर जाकर पूरी फिल्म देखनी होगी.

कहानी की बात करें तो यह एकदम फ्रेश कहानी है. आपको इसका कंटेंट पसंद आएगा. कमजोरियों की बात करें तो फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी रफ्तार है. अगर आप रफ्तार झेल सकते हैं, तो आपको फिल्म के मायने समझ में आ जाएंगे. एक्टिंग की बात करें तो, इस फिल्म में विजय वर्मा की परफॉर्मेंस बताती है कि उनका बॉलीवुड में लंबा करियर होने वाला है. उनका रोल काफी टिपिकल है, और उन्होंने शानदार तरीके से निभाया है. उनके साथ, फातिमा सना शेख भी तारीफ की हकदार हैं, जिन्होंने खुद को एक सीनियर एक्टर के तौर पर पेश किया है. ‘गुस्ताख इश्क’ देखने के बाद आपको इन दोनों एक्टर्स का पोटेंशियल पता चलेगा. नसीरुद्दीन शाह की एक्टिंग जजमेंट से परे है, और मैं कहूंगा कि जब भी नसीरुद्दीन शाह की बायोग्राफी लिखी जाएगी, तो इस फिल्म का जिक्र जरूर होगा. इसके अलावा, शारिब हाशमी का रोल भले ही छोटा हो, लेकिन वह उसमें जान डाल देते हैं.

विभु पुरी ने अपने डायरेक्शन में कोई कसर नहीं छोड़ी है. उन्होंने छोटी से छोटी डिटेल्स पर भी बहुत ध्यान दिया है, और म्यूजिक इस फिल्म की जान है. विशाल भारद्वाज के गाने आपके दिल को छू लेंगे, और हितेश सोनिक ने एक शानदार बैकग्राउंड स्कोर बनाया है. कुल मिलाकर, आप यह फिल्म अपने पूरे परिवार के साथ थिएटर में देख सकते हैं. मेरी ओर से इस फिल्म को 5 में 3.5 स्टार.



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