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Biggest Flop Of 90s: 90 के दशक का बॉलीवुड एक अलग ही दौर था. जहां रोमांस, एक्शन और म्यूजिक का जादू दर्शकों के सिर चढ़कर बोलता था. इसी दौर में शाहरुख खान, सलमान खान और गोविंदा जैसे सितारों ने बॉक्स ऑफिस पर राज किया. लेकिन इस सुनहरे दौर में कुछ ऐसी फिल्में भी बनीं, जिनसे उम्मीदें तो आसमान छू रही थीं, मगर नतीजा पूरी तरह उल्टा निकला. ये वो फिल्म है, जिसमें दोस्त ने दोस्त को हीरो बनाया और प्रोड्यूसर ने पत्नी को हीरोइन बना दिया. लेकिन जब रिलीज हुई तो साबित हुई महाफ्लॉप.

नई दिल्ली. 90 के दशक की शुरुआत में बॉलीवुड में जब बड़े-बड़े सितारों की जोड़ी दर्शकों को दीवाना बना रही थी, उसी दौर में एक फिल्म आई जिसने निर्माण से पहले ही इतना हाइप पैदा किया कि मेकर्स इसे ‘मिस्टर इंडिया’ के बाद अगला बड़ा ब्लॉकबस्टर मान रहे थे. लेकिन रिलीज के बाद फिल्म बुरी तरह फ्लॉप हो गई और मेकर्स को भारी नुकसान उठाना पड़ा. जिस फिल्म की बात कर रहे हैं ये फिल्म है 1993 में बनीं ‘रूप की रानी चोरों का राजा’, जिसे आज भी बॉलीवुड की सबसे बड़ी फ्लॉप फिल्मों में गिना जाता है. इस फिल्म को बड़े सपनों के साथ बनाया गया था.

फिल्म का सफर बेहद दिलचस्प और लंबा था. प्रोड्यूसर बोनी कपूर ने 1987 में ही इस प्रोजेक्ट की घोषणा कर दी थी. शुरू में फिल्म का निर्देशन शेखर कपूर कर रहे थे, लेकिन बीच में कुछ रचनात्मक मतभेदों के कारण उन्होंने प्रोजेक्ट छोड़ दिया. तब बोनी कपूर ने अपने बचपन के दोस्त और नामी एक्टर सतीश कौशिक को निर्देशन की जिम्मेदारी सौंपी. सतीश कौशिक बोनी के साथ-साथ अनिल कपूर के भी काफी अच्छी दोस्त थे. इसलिए दोनों ने फैसला किया कि फिल्म में लीड हीरो की भूमिका अनिल कपूर निभाएंगे.

मेकर्स मिस्टर इंडिया जैसी सफलता की उम्मीद कर रहे थे. इसलिए उन्होंने फिल्म में श्रीदेवी का कास्ट किया. फिल्म की कहानी जावेद अख्तर ने लिखी थी. अनिल कपूर और श्रीदेवी के अलावा, अनुपम खेर, जैकी श्रॉफ और जॉनी लीवर जैसे कलाकार भी अहम रोल में नजर आए थे, लेकिन इतनी तगड़ी कास्ट का भी फिल्म को कोई फायदा नहीं मिला.
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फिल्म एक्शन, कॉमेडी और ड्रामा का मिश्रण थी. कहानी दो चोरों (अनिल कपूर और श्रीदेवी) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपने माता-पिता की हत्या का बदला लेने के लिए खूंखार शातिर व्यापारी जगमोहन जुगराल (अनुपम खेर) के खिलाफ मोर्चा खोलते हैं. फिल्म को बनाने में पूरे 6 साल लग गए.

रिपोर्ट्स के मुताबिक, फिल्म का निर्माण खर्च करीब 8-10 करोड़ रुपये था, जो 90 के दशक में बहुत बड़ी रकम मानी जाती थी. शूटिंग के दौरान कई बार लोकेशन और स्क्रिप्ट में बदलाव हुए. श्रीदेवी उस समय परमसुंदरी का दर्जा रखती थीं, उनकी फीस और स्टारडम भी काफी ऊंचा था. लेकिन फिल्म की शूटिंग के दौरान भी कई बार प्रोडक्शन में देरी हुई.

आखिरकार 16 जुलाई 1993 को फिल्म रिलीज हुई. रिलीज से पहले फिल्म के गानों ने काफी हाइप पैदा किया था. लेकिन थिएटर में फिल्म का प्रदर्शन शुरू होते ही अनिल कपूर को एहसास हो गया कि फिल्म दर्शकों को पसंद नहीं आ रही. प्रीमियर के बाद अनिल कपूर ने अमिताभ बच्चन और सुभाष घई से कहा था, ‘ये फिल्म फ्लॉप हो गई है.’

फिल्म ने भारत में सिर्फ 3.25 करोड़ रुपये की नेट कमाई की. विदेशों सहित कुल वसूली भी 4.5 करोड़ से ज्यादा नहीं पहुंची. इतने भारी बजट वाली फिल्म के लिए यह भारी नुकसान था. बोनी कपूर को इस फिल्म से बहुत बड़ा झटका लगा. आईएमडीबी पर फिल्म को मात्र 4.8/10 रेटिंग मिली. दर्शकों और समीक्षकों ने फिल्म को ओवर-द-टॉप, लंबी और कहानी में दम न होने का आरोप लगाया. हालांकि कुछ गाने आज भी याद किए जाते हैं.

‘रूप की रानी चोरों का राजा’ आज भी इसलिए चर्चा में रहती है क्योंकि यह 90 के दशक की सबसे महंगी और सबसे बड़ी फ्लॉप फिल्मों में शुमार है. यह फिल्म साबित करती है कि सिर्फ बड़े स्टार, मोटा बजट और अच्छी स्क्रिप्ट लिखने वाले लेखक होने भर से फिल्म हिट नहीं हो जाती. सतीश कौशिक बाद में ‘देना पैरों में’ और ‘हमारे दीवाने हो गए’ जैसी फिल्में देकर डायरेक्टर के रूप में स्थापित हुए. अनिल कपूर-श्रीदेवी की जोड़ी आगे भी काम करती रही, लेकिन ‘रूप की रानी चोरों का राजा’ उनकी फिल्मोग्राफी में एक बड़ा फ्लॉप केस स्टडी बनकर रह गई.
